Dhram Sansar

योगी अनंत शिव…

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय|

नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥

वर्तमान समय के दौर में वैश्विक महामारी कोरोना चल रहा है साथ ही सनातन प्रेमियों के विशेष महिने श्रावन की भी शुरुआत हो चुकी है. बताते चलें कि, श्रवण नक्षत्र युक्त पूर्णिमा के कारण इस माह को श्रावण का महीना कहा जाता है. इस पावन व पवित्र महीने में भगवान शिव, रूद्र, भोलेनाथ, औघरदानी, आशुतोष की पूजा अर्चना की जाती है. एक ऐसे भगवान जिनके कई नाम हैं और हर नाम की अलग-अलग विशेषता है जैसे –‘रूद्र’. रूद्र का अर्थ होता है रोनेवाला, उसी  प्रकार उनका एक नाम है शिव. वैसे तो देखा जाय तो शिव की विवेचना ज्ञानी लोग अपने-अपने तरीके से करते हैं. आखिर शिव का अर्थ है क्या? तार्किक दृष्टिकोण हो या वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोण से भी देखते है तो भी शिव का अर्थ और उसके मायने भी एक ही होते हैं. कुछ लोगों का कहना है कि, शिव का अर्थ होता है “ जो नहीं है” या यूँ कहें कि, इसका अस्तित्व नहीं है, धुंधला है या अपारदर्शी है.

अगर हम सभी सनातन परम्परा की बात करें तो भगवान शिव त्रिदेवों में एक देव हैं और इन्हें देवों के देव महादेव के भी नाम से जानते हैं. वेद के अनुसार इनका नाम रूद्र भी है, वहीं ऋग्वेद में जहां सूर्य, वरुण, वायु, अग्नि, इंद्र आदि प्राक्रतिक शक्तियों की उपासना की जाती है वहीं ‘रूद्र’ का भी उल्लेख किया गया है. सागर मंथन से पहले भगवान शिव को रूद्र के नाम से जाना जाता था. रूद्र जिन्हें विनाशकारी शक्तियों के प्रतीक के रूप में गौण देवता माने जाते थे, लेकिन सागर मंथन के बाद रूद्र नये रूप में शिव बने. शिव का विचित्र अमंगल स्वरूप दुसरे देवताओं से अलग है. शिव जो कि, नंग-धडंग, शरीर पर राख लपेटे या मले हुए, जटाजूटधारी, सर्प लपेटे, गले में हडडीयों एवं नरमुंडों  की माला पहने, हाथों में त्रिशूल व डमरू, माथे पर एक और आँख, सिर पर चन्द्रमा को धारण किये हुए और उनका वाहन नंदी तथा गण भूत, प्रेत या पिशाच.

ऐसे अबधूत रूप के धनी जिन्हें औघरदानी भी कहा जाता है और जो सबके लिए सुगम्य चाहे वो, देव हों या दानव. ऐसे अदभुत स्वरूप के स्वामी जो कई प्रकार के चिन्हों का प्रयोग करते है और हर चिन्ह के अपने-अपने महत्व हैं. भगवान शिव को त्रयंबक भी कहा जाता है, आमतौर पर देव हों या दानव उनकी दो ही आँख होती है लेकिन, भगवान शिव की तीसरी आँख भी है. जिस प्रकार दो आँखों से भौतिक पदार्थों को ही देख सकते है उसी प्रकार तीसरी आँख का मतलब होता  है ‘बोध’. ‘बोध’ का अर्थ होता है ऊर्जा को विकसित करना या यूँ कहें कि, अपने स्तर को ऊँचा करना. शिव के कई नाम हैं उन्हें सोम या सोमसुंदर भी कहा जाता है. सोम का एक और अर्थ होता है चंद्रमा वैसे तो सोम का अर्थ होता है नशा. पुरानों में चंद्रमा को नशे का श्रोत भी कहा गया है. नशा सिर्फ बाहरी पदार्थों से नहीं होता है लेकिन, जो अपने आप में मदमस्त हो या यूँ कहें कि, जो जीवन की प्रक्रियाओं में मदमस्त रहता हो. पूर्णिमा की रात्री को जब चंद्रमा अपने पूर्ण आकर में हो तो उसकी शीतल किरने भी मदमस्त लगती है. अगर पूर्णिमा की रात्री में चंद्रमा को एक टक से निहारते हैं तो धीरे-धीरे सुरूर चढने लगता है.

भगवान शिव का वाहन नंदी है. आखिर नंदी का अर्थ क्या होता है? पुरानों के अनुसार नंदी का अर्थ होता है प्रतीक्षा या यूँ कहे अनंत प्रतीक्षा. हिन्दू परम्परा या संस्कृति में इन्तजार करना सबसे बड़ा गुण माना जाता है. इन्तजार जो चुपचाप बैठकर किया जाय और उम्मीद हो कि कल ‘वो’ आ जायेंगें. भगवान शिव के सबसे करीबी नंदी हैं चूकिं नंदी में एक गुण है “ग्रहणशीलता” का. आमतौर पर जब हम सभी मन्दिर जाते हैं तो हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि, मन्दिर के अंदर शांत और सजग होकर बैठना चाहिए. चूकिं यह गुण सिर्फ और सिर्फ नंदी में ही था.

पुरानों में शिव को योगी व अनंत भी कहा गया है और उनके हाथों में हमेशा एक त्रिशूल होता है. त्रिशूल जो जीवन के तीन मूल आयाम है यह उसी को दर्शाता है. त्रिशूल में तीन कोण होते हैं उन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना भी कहते हैं. ये तीनों प्राणमय कोष मानव तंत्र के तीन मुलभुत नाड़ियाँ हैं जिसे हम सभी बाईं, दाहिनी और मध्य के नाम से जानते हैं. मानव शरीर में इन तीन नाड़ियों से प्राणवायु का संचार होता है. भगवान शिव के गले में सर्प की माला होती है. योग में कुंडलिनी का वर्णन होता है, और सर्प को कुंडलिनी का प्रतीक भी माना जाता है. कुंडलिनी का अर्थ होता है ऊर्जा. अगर ऊर्जा स्थिर हो तो उसका पता नहीं चलता है और उसे जाग्रत कर दिया जाय तो उसके स्वरूप का अहसास होता है.

भगवान शिव के मूल मंत्र में पांच मन्त्रों का समायोजन है, जिसे पंचाक्षर भी कहा जाता है. प्रकृति में मौजूद पांच तत्वों के प्रतीक को ही पंचाक्षर माना जाता है. जिस प्रकार मानव शरीर में पांच द्वार कहे गये है और पाँचों द्वार की शुद्धि की जाती है, और इन पांच केन्द्रों को जगाकर योग क्रिया की जाती है. पुरानों के अनुसार भगवान शिव एक लोटे जल और एक वेलपत्र से खुश या प्रसन्न हो जाते हैं. आखिर विल्वपत्र या वेल पत्र शिव को इतना प्रिय क्यों है? पुरानों के अनुसार बेल के वृक्ष को सम्पूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल भी कहा जाता है. चूकिं बेलपत्र को भगवान शिव के त्रिनेत्र रूप का प्रतीक भी माना जाता है या यूँ कहें कि, इसकी तीन पत्तियों को सत्व, रज और तम के रूप में भी जाना जाता है. बेल के वृक्ष के नीचे स्त्रोत या जप करने से उसका फल अनंत गुना बढ़ जाता है.

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