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यूनिकोड किसे कहते हैं?

कंप्यूटर हमारी तरह विभिन्न भाषाऐं नहीं समझ सकता है. यह केवल बायनरी नंबरों ( 0 और 1) को ही समझ सकता है, इसलिये हम जो भी अक्षर टाइप करते हैं वह अंतत: 0 और 1 में ही परिवर्तित किये जाते हैं तभी कंप्यूटर उन्हे समझ पाता है. किस भाषा के किस शब्द के लिये कौन सा नम्बर प्रयुक्त होगा इसका निर्धारण करने के नियम विभिन्न कैरेक्टर-सैट (character-set) या संकेत-लिपि प्रणाली (encoding systems) द्वारा निर्धारित होते हैं. ये प्रत्येक अक्षर और वर्ण के लिए एक नंबर निर्धारित करके अक्षर और वर्ण संग्रहित करते हैं. यूनिकोड का आविष्कार होने से पहले, ऐसे नंबर देने के लिए सैंकडों विभिन्न संकेत लिपि और प्रणालियां थीं.किसी एक संकेत लिपि में पर्याप्त अक्षर नहीं होते है, उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ को अकेले ही, अपनी सभी भाषाओं के अक्षरों को संग्रहित करने के लिये विभिन्न संकेत लिपियों की आवश्यकता होती है. यहां तक कि अंग्रेजी जैसी भाषा के लिए भी, सभी अक्षरों, विरामचिन्हों और सामान्य प्रयोग के तकनीकी प्रतीकों हेतु एक ही संकेत लिपि पर्याप्त नहीं थी.

 

इन संकेत लिपियों में आपस में भी तालमेल नहीं है, इसीलिए  दो संकेत लिपियां दो विभिन्न अक्षरों के लिए, एक ही नंबर प्रयोग कर सकती हैं, अथवा समान अक्षर के लिए विभिन्न नम्बरों का प्रयोग कर सकती हैं. किसी भी कम्प्यूटर को विभिन्न संकेत लिपियों की आवश्यकता होती है; फिर भी जब दो विभिन्न संकेत लिपियों अथवा प्लैटफॉर्मों के बीच डाटा भेजा जाता है तो उस डाटा के हमेशा खराब होने का जोखिम बना रहता है.

युनिकोड का जन्म:- इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिये ही युनिकोड को जन्म हुआ. जैसा इसके नाम से से ही स्पष्ट होता है कि, यह यह सभी भाषाओं के लिये एक ही तरह से काम करता है. यूनिकोड, प्रत्येक अक्षर के लिए एक विशेष नंबर प्रदान करता है, चाहे कोई भी प्लैटफॉर्म हो, चाहे कोई भी प्रोग्राम हो, चाहे कोई भी भाषा हो. यूनिकोड स्टैंडर्ड को ऐपल, एच.पी., आई.बी.एम., माईक्रोसॉफ्ट, औरेकल, सैप, सन, साईबेस, यूनिसिस जैसी उद्योग की प्रमुख कम्पनियों ने इसे अपनाया है.

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