यरुशलम…

यरुशलम…

262
0
SHARE
तीन धर्मों की पवित्र नगरी है यरुशलम ... फोटो:- गूगल

यरुशलम एक प्राचीन शहर है जो तीन धर्मों की पवित्र नगरी है और ये तीन धर्म हैं यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म. कहा जाता है कि यंहा यहूदियों का पवित्र सुलैमानी मंदिर हुआ करता था, जिसे रोमनों ने नष्ट कर दिया था. बताते चलें कि, ये शहर ईसा मसीह की कर्मभूमि रहा है साथ ही हजरत महुम्मद यहीं से स्वर्ग गये थे. इतिहास को उठाकर देखें तो पता चलता है कि यरुशलम 1948 में हुए अरब- इजराइल के युद्ध का युद्ध हुआ था, युद्ध के समय इजराइल का हिस्सा नहीं था, जबकि फिलिस्तीन का हिस्सा 1949 की युद्धविराम संधि के अनुसार है.

बताते चलें कि, संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन विभिजन प्रस्ताव के तहत यरुशलम को अंतर्राष्ट्रीय नगर घोषित कर दिया और नगर को दो भागों में विभाजित हो गया. जिसमें पश्चमी भाग यहूदी भूल था जो कि इजराइल के नियन्त्रण में चला गया और पूर्वी भाग जो मुस्लिम और ईसाई की जनसंख्या वाला क्षेत्र जार्डन के नियंत्रण में चला गया. ज्ञात है कि, फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के अध्यक्ष यासिर आराफात ने 1988 में फिलिस्तीन के आजादी की घोषणा की और यरुशलम को राजधानी घोषित किया. उसके बाद लगातार दोनों पक्षों में हिंसा होती रहती है और एक-दुसरे के इलाके कब्जे होते रहते है पर संयुक्तराष्ट्र इसे कभी मान्यता नहीं देता है और यूरोप के कई देश इसका विरोध भी करते रहते हैं लेकिन, अमेरिका इन मुद्दों पर अपना गोलमोल रुख रखता है. संयुक्तराष्ट्र में इनके खिलाफ आये किसी भी मुद्दे पर चुपचाप वीटो कर देता है.

ज्ञात है कि, वर्तमान अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चुनावी अभियान के दौरान वादा किया था कि, इजराइल-फलिस्तीन विवाद को हमेशा के लिए हल कर देंगे. ट्रम्प ने यरुशलम पर यह कदम उठाकर दावा किया है कि, अपना एक चुनावी वादा पूरा किया. ट्रम्प ने अपना वादा पूरा करने के लिए बरसों पुरानी नीति को पलट दिया है साथ ही दूतावास और तेल अवीव को स्थान्तरित करने का आदेश दिया है. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के फैसले के बाद से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भरी विरोध का सामना करना पड़ रहा है साथ ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने ब्यान जारी कर कहा है कि, यह फैसला अंतर्राष्ट्रीय कानून व संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का गंभीर उल्लघन है सात ही मध्य- पूर्व एशिया की शान्ति प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा है. अमरीकी राष्ट्रपति के फैसले के बाद से ही फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारीयों ने विरोध जताया है.

ज्ञात है कि, यमन पहले से ही जल रहा है और ऐसे हालात में इस तरह के फैसले से भविष्य में मध्य एशिया में तेल और गैस के संकट हो सकते हैं साथ ही मध्य एशिया के देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्धों पर भी असर पड़ सकता है. मुस्लिम देश ईराक चाहता है कि अमेरिका अपने फैसले को वापस लें वहीं, ईरान के अनुसार ऐसा कदम मुसलमानों को उकसा सकता है और दो कट्टर दुश्मन एक भी हो सकते हैं और निकट भविष्य में जंग भी हो सकती है. इस फैसले के बाद से लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है और आगजनी व प्रदर्शन लगातार हो रही हैं. इस फैसले पड़ अगर दोबारा विचार नहीं किया गया तो आने वाले समय में मध्य एशिया की स्थिति विस्फोटक हो सकती है.