मौर्योत्तर कालीन भारत…

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फोटो :- गूगल.

मौर्यों के पतन के बाद कई विदेशी आक्रमण हुए.

इन आक्रमणकारियों में यूनानी, पार्थियन, कुषाण एवं शक थे.

इनका इतिहास सिक्कों के अधर पर लिखा गया.

इनके सिक्को पर लेख यूनानी, बाह्मी, खरोष्ठी लिपि में मिलते हैं.

सबसे पहला आक्रमण देमेत्रियास ने किया.

इसकी राजधानी शाकल थी.

संगम साहित्य के अनुसार हिन्द यूरानी को यूनानी कहा गया है.

यूक्रेटाईड्स ने तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया.

इसके बाद मिनाण्डर ने स्यालकोट को राजधानी बनाया.

यूनानी आक्रमण का प्रभाव – युद्ध शैली पर प्रभाव, कैलेण्डर बनाना, वर्ष का सप्ताह, दिनों में विभाजन, हेलिमिस्टिक कला का प्रचलन.

मिलिन्द्पनाहो में मिनाण्डर एवं बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच वार्तालाप का उल्लेख मिलता है.

सर्वप्रथम मिनाण्डर ने तिथि युक्त सिक्के चलवाये.

शुंग राजवंश का संस्थापक पुष्यमित्र, जो अंतिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ का सेनापति था.

पुष्यमित्र ने दो अश्वमेघ यज्ञ किये.

इसको बौद्ध धर्म का उद्धारक माना जाता है.

इस वंश का 9वां शासक भागभद्र था, जिसके दरबार में यूनानी राजदूत एण्टियाल कीड्स आया था.

इसने भरहुत स्तूप का निर्माण एवं साँची स्तूप का पुनरूद्धार किया.

पहलव वंश :- इस वंश का प्रथम शासक माउस था.

गोणडोफर्नीज इस वंश का महत्वपूर्ण शासक था.

कुषाण वंश :- ये यूची कबीले के थे.

कैडफाईसिस कुषाण वंश का प्रथम शासक था.

जिसने महाराज की उपाधि धारण की.

अगला शासक विम कैडफाईसिस था, जिसने महेश्वर की उपाधि धारण .

मौर्यों के बाद सबसे बड़े साम्राज्य के संस्थापक कुषाण थे.

कनिष्क वंश :- इसने शक संवत चलाया.

इसकी राजधानी पुरुषपुर थी.

कनिष्क ने चीन के साथ युद्ध किया.

कश्मीर में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया था.

इसने चीन, जापान, तिब्बत में बौद्ध धर्म प्रचारक भेजे.

एशिया का एकमात्र शासक, जिसका राज्य पामीर के पठार के पार तक था.

इसने विश्व प्रसिद्द रेशम मार्ग पर अधिकार किया था.

जिसे शल्य चिकित्सा में महारथ प्राप्त थी.

अश्वघोष इसका दरबारी कवि था.

नागार्जुन कनिष्क का पुरोहित था.

चरक इसका राजकीय चिकित्सक था.

संगम वंश :- चेर, चोल, पाण्ड्य इस काल के प्रमुख राजवंश थे.

तृतीय संगम का आयोजन मदुरै में किया गया.

द्वितीय संगम का आयोजन कपाटपुरम में किया गया था.

प्रथम संगम का आयोजन मदुरै में किया गया था.

शिल्पादिकाराम का लेखक- इलाओगादीकल.

मणिमैखलई – सीतलैसत्तनार.

जीवकाचिन्तामणि – तिरुक्कदेवर.

सातवाहन वंश :- अभिलेखों के आधार पर इनका मूल स्थान महाराष्ट्र को माना जाता है.

इसके सिक्कों पर दो पतवारों के साथ जहाज का अंकन मिलता है.

खारवेल ने इनके राज्य पर आक्रमण किया था.

गौतमीपुत्र शातकर्णी इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था.

इसने वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की और वर्ण व्यवस्था को पुनः स्थापित किया.

इसके बाद वरिष्ठ पुत्र पुलमावी शासक हुआ.

शातकर्णी प्रथम- जिसकी पत्नी नागनिक थी ने कुछ समय तक शासन किया.