पुस्तकें मुर्दा दिलों में भी जान डाल देती हैं :- प्रो० गौरी...

पुस्तकें मुर्दा दिलों में भी जान डाल देती हैं :- प्रो० गौरी शंकर

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करीब तीन दशक पूर्व का समय बच्चों की रीडिंग हैबिट के लिहाज से स्वर्णयुग था.

शुक्रवार को अंतर्राष्ट्रीय बाल-पुस्तक दिवस के अवसर पर जमुई जिला मुख्यालय स्थित आनंद विहार कॉलोनी, सिर चंद नवादा में पुस्तकों के महत्व विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया. इस परिचर्चा की अध्यक्षता केकेएम कॉलेज के प्रो० डॉ० गौरी शंकर पासवान ने की. इस मौके पर प्रो० गौरी शंकर पासवान ने कहा कि, मानव जीवन में पुस्तकों का विशेष महत्व है. पुस्तकें बच्चों की सच्ची दोस्त होती है.  किताबों से प्राप्त ज्ञान भविष्य में आगे का मार्ग दिखाता है. उन्हें उनकी इतिहास का ज्ञान भी कराती है. आज के दिन बच्चों को उनसे संबद्ध पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.

प्रो. पासवान ने कहा कि पुस्तकें मुर्दा दिलों में भी जान डाल देती हैं. उन्होंने कहा कि करीब तीन दशक पूर्व का समय बच्चों की रीडिंग हैबिट के लिहाज से स्वर्णयुग था. उस समय टीवी कार्टून, चैनल की मौजूदगी नहीं के बराबर थी. इतना ही नहीं लगभग 5 साल पूर्व बच्चों के हाथों में सिर्फ पुस्तके हुआ करती थी लेकिन, आज उनके हाथों में मोबाइल, स्मार्टफोन, और टीवी रिमोट आ गए हैं, जिनपर गेम खेलना बच्चों की आदत बन गई है. उन्होने कहा कि वर्तमान में हम विजुअल विस्फोट के समय से गुजर रहे हैं. इनमें पुस्तकों से दोस्ती की बात बेमानी लगती है. स्मार्टफोन की दखल बढ़ गई है. नई पीढ़ी के पास छपी हुई पुस्तकों के बजाय किताबों का खाजाना आ गया है. इस पीढ़ी के छात्र छोटी सी पेन ड्राइव में दर्जनों पुस्तकें हर समय रखने लगे हैं. इंटरनेट के कारण बच्चे बहुत आगे बढ़ गए हैं.

प्रो. पासवान ने कहा कि, आज किताबें छापने भी बंद होने लगी है. जैसे दोहा, कविता कहानियां लतीफा चुटकुले कहावतें, कोटेशन, और सूक्तियां इत्यादि पुस्तकों में नहीं बल्कि स्मार्टफोन में ही मिल जाते हैं. यूट्यूब में ये सभी उपलब्ध हैं. ऐसा लगता है कि आने वाले लगभग 30 वर्षों में अखबार, पत्रिका और किताबों के छापने का काम बंद हो सकता है. क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में युवक अपनी किताब खुद छाप लेते हैं,और बेच  भी देते हैं. यह सब आज के बच्चों के बाएं हाथ का खेल हो गया है.

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभात कुमार भगत एवं मनोज कुमार ने कहा कि बच्चे भावी संसार की धरोहर होते हैं. उनके कोमल मन पर उनकी कोर्स की किताबों के अलावा बाल साहित्य का भी गहरा प्रभाव पड़ता है. बाल साहित्य बच्चों के सर्वांगीण विकास की आधारभूत तैयार करता है. आज बच्चों और साहित्य की दूरियां बढ़ती जा रही है. समय के साथ-साथ कंप्यूटर गेम, वीडियो गेम और मोबाइल गेम्स का चलन काफी बढ़ता चला जा रहा है.

प्रो० देवेंद्र कुमार गोयल तथा अधिवक्ता रामचंद्र रैदास ने कहा कि पुस्तक हमारी सभ्यता की धरोहर होती है. पुस्तकें हमें हंसाती हैं और रुलाती भी हैं. ये हमें जीवन की सीख देती उन्होंने कहा कि विश्व विख्यात लेखक एंडरसन का जन्म 02 अप्रैल 1805 को हुआ था, जिन्हें सामान देने के लिए 02 अप्रैल 1967 से विश्व बाल पुस्तक दिवस मनाया जाता है.  इस अवसर पर विपुल कुमार, अतुल कुमार अभिनव आनंद कई छात्र और बुद्धिजीवी भी उपस्थित थे.

प्रभाकर मिश्रा(जमुई).