पुत्रदा एकादशी… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

पुत्रदा एकादशी…

वालव्याससुमनजीमहाराज कहते हैं पौष (पूस) का महीना अत्यंत ही पावन और पवित्र महीना होता है. हिन्दू पंचांग के अनुसार साल के दसवें माह का नाम पौष हैं चुकिं इस महीने में चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में रहता है इसीलिये इस मास का नाम पौष पड़ा. महाराजजी कहते हैं कि,  पद्म पुराण में पौषमास के कृष्णपक्ष की एकादशी के बारे में विस्तृत चर्चा की गई है.

वालव्याससुमनजीमहाराज

महाराजजी कहते हैं कि, पौष (पूस) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहते हैं और  इस व्रत की कथा सुनने मात्र से वाजपेयी यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है. संतान सुख की इच्छा रखने वालों इस व्रत का पालन करने से संतान की प्राप्ति होती है. पुराणों के अनुसार दशमी तिथि को शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए. एकादशी का व्रत रखने वाले को अपने मन को शांत व स्थिर रखना चाहिए, और किसी भी प्रकार के द्वेष की भावना या क्रोध नहीं करना चाहिए साथ ही परनिंदा व चुगली से दूर रहना चाहिए.

व्रत विधि:-

एकादशी के पूर्व दशमी को रात्री में एक बार ही भोजन करना आवाश्यक है उसके बाद दुसरे दिन सुबह उठ कर स्नान आदि कार्यो से निवृत होने के बाद व्रत का संकल्प भगवान विष्णु के सामने संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना करें. भगवान विष्णु की पूजा के लिए धूप, दीप, फल और पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए. भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए विधिपूर्वक पूजन करें.

पूजन सामाग्री:-

रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल, दूध, दही, गाय का घी, दीपक, हरा रंग का धागा, सुपाड़ी, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, नीबूं, नवैध, केला, कद्दू का खीर और तुलसी पत्र व मंजरी.

कथा:-

द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था. उसका मानना था कि, जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं. पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए, परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई. वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा, हे “प्रजाजनों” मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है, न ही मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन भी छीना हूँ. किसी दूसरे की धरोहर को भी मैंने नहीं ‍ली है, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा हूँ.  मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा, कभी भी किसी से घृणा नहीं की, और सबको समान भी माना हूँ, सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ, इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है. सो मैं अत्यंत दुखी अनुभव कर रहा हूँ, इसका क्या कारण है आपलोग ही बताइए?

राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए, वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए और राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे. एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था. सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया, और उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि, आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित ही करूँगा, मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करना. लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले, “हे महर्षे” आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं, अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए. महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है, फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है. उन लोगों ने आगे कहा कि, हम लोग उसकी प्रजा हैं, और हम सभी राजा के दुःख में दुखी: हैं, अत: आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास हो रहा है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा, क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से भी अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं. अत: अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय हमें बताने का कष्ट करें.

इन सभी बातों को सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि, यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था. निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म भी किए. यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था. एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह जबकि खुद भी दो दिन से भूखा-प्यासा था, और एक जलाशय पर जल पीने गया. उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी.

राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पर रहा है. एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है. ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि महात्मन्, कोई उपाय हो तो हमें बताइए, किस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए. लोमश मुनि ने कहा कि, श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी. लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई, और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई, तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया. इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया. उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र पैदा हुआ. अत: संतान सुख की इच्छा हासिल करने वाले इस व्रत को अवश्य करें. इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है, और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है.

ध्यान दें….

प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करे तथा स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान् विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं, और भगवान् विष्णु की पूजा में तुलसी, ऋतु फल एवं तिल का प्रयोग अवश्य करें. व्रत के दिन अन्न वर्जित करें, निराहार रहें और शाम में पूजा के बाद चाहें तो फल ग्रहण कर सकते है. यदि आप किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं तो भी, एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए. एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व होता है, अगर संभव हो तो, रात में जगकर भगवान का भजन कीर्तन करें. एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है. अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें.

एकादशी का फल:-

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्रीरामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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