परिवर्तन…

परिवर्तन…

59
0
SHARE
छायाचित्र :- जेपी.

वर्तमान समय में मानव अपनी ही कुटिल चालों में फंस गया है. जैविक विषाणुओं का निर्माण और परीक्षण के कारण आज मानव अपने ही घरों में कैद होकर रह गया है. मानव अपने शौक को पूरा करने के लिये स्वछंद विचरण करने वाले प्राणियों को पिजरों में बंद कर रखते है. जरा सोचिये… जिन प्राणियों को पिंजरे में बंद कर रखते हैं उन प्राणियों के मन- मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता होगा…? आज जब खुद को घरों में कैद करने की बारी आई तो आप परेशान होकर सोच रहें है कि कब उन्हें भी स्वछंद विचरण करने की आजादी मिलेगी.                                   

वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व में बस एक ही चर्चा हो रही है वो है कोरोना. वास्तव में कोरोना एक विषाणु है जिसके कारण मानव के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. मानव अपने जीवन को बचाने के लिए जदोजहद कर रहा है. ज्ञात है कि मानव सभ्यता के इतिहास में विज्ञान का अहम् किरदार है जिससे मानव उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहा है. वहीं मानव अपनी ही सभ्यता को खत्म करने के लिये नये-नये जैविक विषाणुओं की खोज कर रहा है. मानव ने इतनी तरक्की कर ली है कि अपनी सभ्यता और धरती को नष्ट करने के लिये तमाम तरह के उपाय करने में हिचक न होती है.

वर्तमान समय में मानव घरों में कैद होकर परेशान हो गया है वहीं, इस दौरान प्रकृति अपने नये रंग रूप में वापस आ रही है. वर्षों बाद आसमान का रंग नीला दीखता है, ठंडी पवन के झोकें मन को आनंदित कर देती है वहीं, नदियों का पानी स्वच्छ हो गया है और पेड़-पौधों को देखकर दिल में सुकून का अनुभव होता है. एक समय ऐसा था… कि पक्षियों के स्वर लुप्त ही हो गये थे लेकिन, वर्तमान समय में पक्षियों के स्वर से मन परमानन्द से भाव-विभोर जाता है.

वर्तमान समय के भारत में ग्रीष्म ऋतू अपने चरम की ओर अग्रसर है लेकिन इस मौसम में जहाँ पिछले साल को याद करते हैं तो इस वक्त लोग अपने घरों और खुद को ठंडा रखने के लिये तमाम तरह के उपाय करते थे लेकिन, वर्तमान समय में प्रकृति अपने नये कलेवर से हर दिन एक नये स्वरूप में दर्शन हो रहें हैं. बताते चलें कि, भारत में 15 मार्च-15जून तक ग्रीष्म ऋतू होती है और लू के थपेड़ों से मानव सहित पशु- पक्षी भी परेशान रहते थे.

वर्तमान समय में लोग घरों में कैद है साथ ही कल-कारखाने व डीजल चलित मशीने भी बंद हो गई है. कल-कारखाने व डीजल चलित मशीने से निकलने वाले धुंए व विषैले रसायन वायुमंडल में मिल नहीं रहे हैं जिसके कारण प्रकृति अपने पुराने स्वरुप में लौट रही है. हर दिन की नई सुबह एक नये अहसास देकर झुम ही है. बुजुर्गों के चेहरों की रौनक लौट रही है. अब बुजुर्ग भी लोगों को बता रहे है कि, बहुत हुआ शहरों में रहना अब घर लौट चलों जहाँ मिटटी की सोंधी खुशबु से मन को आनंदित किया जाय, जीवन को नई दिशा दी जाय. शहरों में क्या रखा है? जो मजा गाँव में है, अपनी मिटटी में है, वो मजा शहर में नहीं. शहर में रहना तो सजा है, मज़बूरी है, लेकिन अपनी मिटटी में रहने का आनन्द ही कुछ और है.

प्रक्रति के नये स्वरूप ने मानव को अपने इतिहास और संस्कृति की याद दिला दी है. जिस प्रकार सुबह होने पर पक्षियाँ अपने घोसलों से निकलकर दाना चुग कर शाम होने पर वापस आ जाती है उसी प्रकार वर्तमान समय में लोगों को अपनी मिटटी की याद आ गई है. लाकडाउन क्या हुआ कि अब लोग वापस अपनी मिटटी की ओर लौटने लगे हैं.