ताड़ से गिरे खजूर पे अटके…

ताड़ से गिरे खजूर पे अटके…

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कोरोना ने देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ तोड़कर आम जन-जीवन को पुरातन युग में वापस लौटने को मजबूर कर दिया. pix by google.

पौराणिक ग्रंथों में युग परिवर्तन का वर्णन मिलता है, आखिर युग परिवर्तन है क्या…? वर्तमान समय 21वीं सदी चल रहा है। इस सदी के लोग डिजिटल युग में जी रहे है. आखिर डिजिटल का अर्थ… एक आभासी दुनिया. इस सदी में कोरोना नामक एक बीमारी आई और ज़िंदगी के मायने ही बदल दी. ऐसा लगता है मानो हम सभी पुन: पुरातन युग की तरफ लौट रहें हैं. यह दुनिया कितनी आभासी होगी इसकी झलक ने ही मानव का वजूद ही बदल दिया.

भारतीय सभ्यता संस्कृति जितनी पुरातन है उतनी ही यहाँ की शासन व्यवस्था. राजा-महाराजा से लेकर गुलामी तक… आजादी के बाद वर्तमान समय की राजनीतिक व्यवस्था तक. कोरोना ने हर कुछ के अंदाज ही बदल दिये. प्रकृति अपने स्वभाव में परिवर्तनशील है वहीं, मानव की दो विचारधारें के साथ अपने वजूद बचाने की होड़ में लगें हैं. कभी ऐसा महसूस होता है कि पौराणिक ग्रन्थों में लिखी गई बातें सौ प्रतिशत सत्य ही हैं. वर्ष 2004 में आई सुनामी के झटके से अभी उबरा भी ना था तबतक भूकंप के लगातार झटकों ने धो डाला. रही-सही कसर कोरोना ने दम निकाला.

21वीं सदी और कोरोना ने देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ तोड़कर आम जन-जीवन को पुरातन युग में वापस लौटने को मजबूर कर दिया. बताते चलें कि नदियों को साफ करने के लिए हर साल करोड़ो व अरबों रुपए खर्च किए जाते थे लेकिन कोरोना की आहट से मुफ्त में ही वायु और नदियां स्व्च्छ हो गई. कोरोना को याद करते ही एक साल की कड़वाहट सामने आ जाती है कैसे लोग जान बचाने के लिए पैदल ही अपने वतन की मिट्टी में लौट गए. सरकार का नारा है “दो गज की दूरी मास्क है जरूरी” वहीं, दूसरी ओर सोशल डिस्टेनसिंग. क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि विकास के नाम पर प्रकृति से छेड़-छाड़ कर मौत के करीब जा रहें है जिसकी चेतावनी लगातार दे रही है और हम अनदेखा कर ईक अंधी दौर में दौड़ लगा रहें हैं.

वर्तमान समय में कोरोना के साइड इफेक्ट आम जन-मानस पर दिखाई देने लगा है या यूं कहें कि सत्ता की भूख ऐसी छाई की खुद को भगवान ही समझ बैठे. बीते समय में महंगाई कभी डायन हुआ करती थी लेकिन आज महंगाई सौतन बन गई है. काम के घंटे और समय भी तय हो गए, पेट में आग लगी है और रोटी के लाले भी ना कारखाने हैं ना रोजगार ही ना सरकारी सहायता, युवा रोजगार की खोज में दर-दर भटक रहें हैं साथ ही उम्मीद भी टूट रही… फिर भी देश में विकास अपने श्वाब पर…? सत्ता की सुख और गलत नीति के कारण आम-आवाम खुद को शट-डाउन के लिए  मजबूर है या यूं कहें कि “ताड़ से गिरे और खजूर पे अटके” यह मूहवारा आज यथार्थ साबित हो रही है.

सदी के परिवर्तन से ही महंगाई कभी डायन हुआ करती थी लेकिन आज महंगाई सौतन बन गई… एक समय था कि ‘प्याज के आँसू से सरकार गिर गई थी आज वो समय है कि महंगाई के कारण सरकार की तिजोरी भर रही है.

रिश्तों कीं कशमसाहट घर-बाहर आम हो गई है. जो कभी दिवास्वपन हुआ करती थी आज वो खास हो गई है. किताबों की बाते… किताबों में ही शोभा देती है. वर्तमान की अंधी-दौड़ में अपने वजूद को बचाने के लिए कोशिशों का दौर चल रहा है. पूरी दुनिया एक बाजार हैं और हम सभी रुपए की अंधी दौर में भाग रहें हैं. सरकारी नीतियों में हुई गलतियों की सजा से लगातार आम-आवाम परेशान हैं. आधुनिक सोच और विज्ञान ने मिलकर कम समय में ही टीके की ही खोज कर एक नए  युग की चुनौतियों पर विजय का आगाज कर दिया.