जूता…

जूता…

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वर्तमान परिदृश्य की घटनाओं पर आधारित नाटक है जूता. इस नाटक को योगेश चन्द्र श्रीवास्तव ने लिखा है. इस नाटक में दो दोस्तों के बीच दौलत एवं इमानदारी के द्वंद को दिखाया गया है.

कहानी:-

दो दोस्त हैं रंजीत और नितेश. रंजीत के पास काफी दौलत है जबकि नितेश गरीब और ईमानदार है. एक दिन रंजीत अपने दोस्त नितेश की ईमानदारी को चुनौती देते हुये अखबार में विज्ञापन निकलवाता है कि पांच जुटे खाइये बदले में बीस हजार रूपये पाईये. इस पर नितेश रंजीत से कहता है कि जिस दिन मेरी ईमानदारी हार जायेगी उस दिन मै मर जाऊंगा लेकिन, यदि तुम्हारी दौलत हार गई तो तू पागल हो जाएगा और घुट-घुट कर मरने के लिये जिन्दा रहेगा.

रंजीत के विज्ञापन निकलवाने के बाद जुते खाने वालों की लाईन लग जाती है. लाईन तो खत्म नहीं होती पर रंजीत की दौलत खत्म हो जाती है. ईधर नितेश की ईमानदारी बीमार माँ व भाई-बहन की भूख के सामने दम तोड़ देती है और रंजीत के पास जुते खा कर रूपये लेने के लिये आता है. जब नितेश जान जाता है कि रंजीत कंगाल हो गया है तो नितेश हार्ट-अटैक होने के कारण मर जाता है. इधर रंजीत पागल हो जाता है और लोग उसे जूते मारने लगते हैं.

जिंदगी अगर जीना है तो स्वाभिमानी बनो लेकिन, अंहकारी मत बनो. अगर अहंकारी बनोगे तो आपका भी हाल रंजीत के जैसा होगा.