कहर…

कहर…

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कोरोना कहर में पिस रहे व्यापारी... छायाचित्र:- ज्ञानसागरटाइम्स.

विश्व मानस पटल पर त्रिशक्तियों का खतरा हमेशा बना रहता है. ये तीन शक्तियाँ है अमेरिका, रूस और चीन. एक समय था जब इन महाशक्तियों के बीच हथियारों की होड़ लगी रहती थी. लेकिन, 20वीं सदी की शुरुआत होते ही जैविक हथियारों की होड़ शुरू हो गई. इन तीन महाशक्तियों के आपस की टकराहट के कारण वर्तमान समय में पूरी दुनिया मौत के मुहँ के पास खड़ी हो गई है.

वर्तमान समय में अमेरिका और चीन की टकराहट इस कदर बढ़ गई है कि पूरा विश्व का अस्तित्व खतरे में आ गया है. जिसका ताजा उदाहरण है ‘कोरोना’. कोरोना के कारण आज विश्व के लोग अपनी जान बचाने के लिए घरों में कैद हो गये है. इस आधुनिक दुनिया में लोग इसे लॉकडाउन कहते हैं.

हमारी जहाँ तक समझ है उस समझ के अनुसार मैं चीन को धन्यवाद देता हूँ. चीन के कारण ही पूरी दुनिया में स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा रहा है. भारत ऐसे गरीब मुल्क में भी स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. विश्व में लॉकडाउन हुआ जिसके कारण यहाँ का वायुमंडल भी  स्वस्थ हो रहा है. कुछ समय पूर्व तक चीन में हाहाकार मचा था लेकिन, अब वहां काफी शांति है. वहां लोग अपना सामान्य जीवन जीना शुरू कर दिया है. कभी-कभी महसूस होता है कि आने वाले समय में चीन कोरोना से बड़ा धमाका करने वाला है…कोरोना तो बहाना मात्र है? चीन अपनी विस्तार वादी सोच और घृणित मानसिकता के साथ पूरी दुनिया पर हुकूमत करने के लिए नये-नये बहाने खोज रहा है.

कुछ समय पूर्व तक अमेरिकी राष्ट्रपति जलवायु में परिवर्तन हो रहा है ऐसा नहीं मानते थे लेकिन, वर्तमान समय में वातवरण साफ़ हुआ है. ओजोन परत में मजबूती आ रही है. विगत कुछ दिनों से कल-कारखाने सहित ईंधन से चलने वाले उपकरण बंद हो गये हैं. जिसके कारण प्रदूषण के स्तर में भारी कमी हुई है.

कोरोना के डर से आज मुल्क सहित विश्व में भी लोग आधुनिकता को छोड़ रहे हैं. खासकर भारतीय लोग जो अपनी आधुनिक सोच के कारण अपनी संस्कृति को भूल रहे थे या यूँ कहें कि, भूलने की कोशिस में लगे थे वही, लोग वर्तमान समय में उस संस्कृति को याद कर रहें और अपनी विरासत को नई दिशा में ले जाने को अग्रसर भी हो रहें हैं.

एक तरफ कोरोना का डर तो दूसरी तरफ मददगारों के हाथ… अचानक आई त्रासदी के कारण देश के कई भागों में यात्री सहित कामगार फ़ंस गये हैं. कई ऐसे भी है जिनके पास कुछ रुपया है तो कुछ के पास नहीं है. इन कामगारों को दो वक्त की रोटी और नींद मय्यसर नहीं हो रही है. वहीं, कुछ प्रदेशों से इन कामगारों को भगाया भी जा रहा है.

पुरे विश्व में भारत ही ऐसा मुल्क है जहाँ कामगारों को उपेक्षित नजर से देखा जाता है? ये कामगार सिर्फ इस देश में वोट बैंक होते हैं. इन पर राजनीति तो होती है लेकिन… वर्तमान समय में आलम यह है कि, फल मंडी में फल गाड़ियों में ही सड़ने लगी है. ट्रक के कर्मचारी उसे निकाल कर फेंक रहें हैं. ऐसा लगता हैं मानो स्वच्छ भारत की धज्जी उड़ रही है. वहीं ट्रक मालिकों को समझ में नहीं आ रहा है कि, अब कैसे काम चलेगा? एक तरफ गाड़ी की किश्त तो दूसरी तरफ कर्मचारियों का पेमेंट कैसे होगा यह सब. ऐसा ही हाल प्राइवेट कम्पनियों में काम करने वाले कामगारों, होटलों, ढाबों में काम करने वालों सहित मजदूरों का भी हैं. कोरोना के कहर के कारण भारतीय कामगारों को रीढ़ की हड्डी चटकती नजर आ रही है.