कटहल…

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स्वाद एव पौष्टिकता की दृष्टि से कटहल का फल अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. छायाचित्र :- दीनानाथ शर्मा.

दुनिया के चुनिंदा सबसे बड़े भारी और रहस्यमयी फल व सब्जी के रूप में गिना जाता है कटहल. इसके सब्जी और फल होने पर भी कई मतभेद हैं. वहीं इसका सेवन बड़ा गुणकारी माना जाता है लेकिन, कुछ लोग इसे देखना तक पसंद नहीं करते साथ ही इसका स्पर्श भी अशुभ माना जाता है. तो कहीं इसका प्रयोग तंत्र-मंत्र में उपयोग के लिए किया जाता है. ज्ञात है कि कटहल पकने के बाद बहुत ही स्वादिष्ठ और मीठा हो जाता है. भारत में इस फल से सब्जी, आचार और कई तरह के जायकेदार व्यंजन बनाए जाते हैं. स्वाद एव पौष्टिकता की दृष्टि से कटहल का फल अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. इसके फल बसंत ऋतु से वर्षा ऋतु तक उपलब्ध होते हैं.

कटहल का वृक्ष शाखायुक्त, सपुष्पक तथा बहुवर्षीय होता है. कटहल का पौधा एक सदाबहार, 8-15 मी. ऊँचा बढ़ने वाला, फैलावदार एवं घने क्षेत्रकयुक्त बहुशाखीय वृक्ष होता है. यह दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल-निवासी है. कटहल को अंग्रेजी में “जैक ट्री” कहा जाता है. इसका वानस्पतिक नाम है Artocarpus heterophyllus (आर्टोकार्पस हेटेरोफिल्लस). कटहल आकार में छोटे और काफी बड़े दोनों प्रकार के हो सकते हैं. इस फल की बाहरी त्वचा नुकीली होती है. पकने पर यह फल अंदर से पीला हो जाता है, जिसे लोग बहुत चाव से खाते हैं. कटहल को शाकाहारियों का मांस भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी सब्जी बनने के बाद बिल्कुल मांस जैसी दिखती है.

पौष्टिक तत्व:-

कटहल में कई पौष्टिक तत्वं पाए जाते हैं जिनमें विटामिन ए, सी, थाइमिन, पोटैशियम, कैल्शिकयम, राइबोफ्लेविन, आयरन, नियासिन और जिंक साथ ही इसमें खूब सारा फाइबर भी  पाया जाता है. ख़ास बात तो यह है कि इसमें कैलोरी नहीं होता है.

खेती:-

भारत वर्ष में इसकी खेती पूर्वी एवं पश्चिमी घाट के मैदानों, उत्तर-पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों, संथाल परगना एवं छोटानागपुर के पठारी क्षेत्रों, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बंगाल के मैदानी भागों मंन मुख्य रूप से की जाती है. कटहल के पौधे को सभी प्रकार के भूमि में उपजाया जाता है. खासकर अच्छी जल निकास की व्यवस्था वाली गहरी दोमट मिट्टी इसके पैदावार के लिए उपयुक्त होती है. मध्यम से अधिक वर्षा एवं गर्म जलवायु वाले क्षेत्र कटहल के खेती के लिए उपयुक्त होते है.

पुष्पण एवं फलन:-

कटहल एक मोनोसियस पौधा है जिसमें नर एवं मादा पुष्पक्रम (स्पाइक) एक ही पेड़ पर परन्तु अलग-अलग स्थानों पर आते हैं. नर फूल, जिसकी सतह अपेक्षाकृत चिकनी होती है, नवम्बर-दिसम्बर में पेड़ की पतली शाखाओं पर आते हैं. कुछ समय बाद ये फूल गिर जाते हैं जबकि, मादा फूल मुख्य तने एवं मोटी डालियों पर जनवरी-फरवरी में एकल एवं गुच्छे में आते हैं जिनके साथ नर पुष्प भी निकलते हैं. कटहल एक परपरागित फल है जिसमें परागण समकालीन नर पुष्प से ही होता है जबकि, मादा फूल में समान परागण नहीं होता है तो फल विकास सामान्य नहीं होता है.

परागण के पश्चात पुष्पक्रम का आधार, अंडाशय और द्लाभ एक साथ विकसित होकर संयुक्त फल का विकास होता है. यह फल जनवरी-फरवरी से जून-जुलाई तक विकसित होते रहते हैं. इसी समय में फल के अंदर बीज, कोया इत्यादि का भी विकास होता है. जून-जुलाई में इसके फल पकने लगते हैं.

फायदें:-

  • पके हुए कटहल के पल्प को अच्छी तरह से मैश करके पानी में उबाला जाए और इस मिश्रण को ठंडा कर एक गिलास पीने से ताजगी आती है, यह दिल के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है.
  • कटहल में पोटैशियम पाया जाता है जो कि दिल की हर समस्याओं को दूर करने में सहायक होता है.
  • इस रेशेदार फल में काफी आयरन पाया जाता है और एनीमिया को दूर करने में सहायक होता है, साथ ही शरीर में रक्तसंचार को बढ़ाता है.
  • इसकी जड़ अस्थमा के रोगियो के लिए लाभदायक मानी जाती है इसकी जड़ को पानी के साथ उबाल कर बचा हुआ पानी छान कर पीने से अस्थमा के रोगियों को आराम मिलता है.
  • थायराइड के रोगियों के लिए कटहल का सेवन करना उत्तम माना जाता है चुकिं, इसमें मौजूद सूक्ष्म खनिज और कॉपर थायराइड चयापचय के लिये प्रभावशाली होता है.
  • हड्डियों के लिए कटहल का फल बहुत ही गुणकारी होता है. इसमें मौजूद मैग्नीशियम हड्डी में मजबूती लाता है तथा भविष्य में ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या को दूर करने में सहायक होता है.
  • इसमें विटामिन ‘सी’ और ‘ए’ पाया जाता है अत: रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक होता है. यह बैक्टेरियल और वाइरल इंफेक्शन से भी बचाता है.
  • कटहल अल्सर और पाचन संबंधी समस्यार को दूर करने में सहायक होता है.
  • कटहल का फल आंखों की रोशनी भी बढ़ती है साथ ही त्वचा को निखरने में मदद करती है.
  • विटामिन-सी के एंटीऑक्सीडेंट गुण और कोलेजन के गठन की क्षमता इसे त्वचा के लिए खास पोषक तत्व बनाती है. अध्ययनों के अनुसार, विटामिन-सी सूर्य की हानिकारक पैराबैंगनी किरणों से भी त्वचा को बचाने का काम करता है.

नुक्सान:-

कटहल को अधिक मात्रा में खाने से एलर्जी, डायरिया और मधुमेह हो सकता है.