इन्दिरा एकादशी…

इन्दिरा एकादशी…

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‘हे अच्युत, हे पुंडरीकाक्ष, मैं आपकी शरण हूं, आप मेरी रक्षा कीजिए, मेरे दुखों को दूर कीजिए.फोटो :- गूगल

सत्संग के दौरान एक भक्त ने महाराजजी से पूछा कि, महाराजजी पितृपक्ष में जो एकादशी मनाई जाती है उसके करने की विधि और कथा का भी श्रवण कराइए.  वाल्व्याससुमनजीमहाराज कहते है कि, एकबार राजा युधिष्ठिर ने भी श्यामसुन्दर से यही सवाल किया था. तब मधुसुदन ने कहा कि, यह एकादशी पितृपक्ष में मनाई जाती है, और ये पितरों की मुक्ति के लिए उत्तम मानी गई है, चुकिं, यह आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी, या यूँ कहें कि,पितृपक्ष में मनाई जाने वाली एकादशी को ही इन्दिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है. तब भगवान श्यामसुन्दर ने राजा इंद्रसेन और देवर्षि नारद के संवाद को महाराज युधिष्ठिर से कहते हैं…

व्रत विधि :-

एकादशी के पूर्व दशमी को रात्री में एक बार ही भोजन करना आवाश्यक है उसके बाद दुसरे दिन सुबह उठ कर स्नान आदि कार्यो से निवृत होने के बाद व्रत का संकल्प भगवान विष्णु के सामने संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना करें. भगवान विष्णु की पूजा के लिए धूप, दीप, फल और पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए. भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए विधिपूर्वक पूजन करें. ध्यान दें…. एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणो को अन्न दान, जनेऊ व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

पूजन सामाग्री :-

वेदी, कलश, सप्तधान, पंच-पल्लव, रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल,  दूध,  दही,  गाय के घी का दीपक, सुपाड़ी, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, नीबूं, नवैध, केला और तुलसी पत्र व मंजरी.

कथा:- 

सतयुग में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसका प्रतापी राजा इंद्रसेन धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करते थे. वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और भगवान विष्णु का परम भक्त था. एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो, आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए, और  राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़े हो गये और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया. सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन? आपके सातों अंग तो कुशलपूर्वक हैं ना? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो लगा रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा, हे महर्षि? आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं. आप कृपा करके अपने आगमन का कारण बताइए, तब देवर्षि नारद ने कहा कि हे राजन? आपको आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को ध्यानपूर्वक सुनो.

एक बार मैं, ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की. उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा, और उन्होंने संदेशा दिया है सो मैं तुम्हें कहता हूँ. उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में ‍कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन महीने की कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है. इतना सुनकर ही राजा कहने लगे कि, हे महर्षि, आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए. नारदजी कहते हैं कि,  आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर, पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें, फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें, और एक बार भोजन करें. प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करते हुए प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा.

हे अच्युत, हे पुंडरीकाक्ष, मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें. पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें, तथा ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें. रात में भगवान के निकट जागरण करें, इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ तथा भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें. नारदजी कहते हैं कि हे राजन, इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे, इतना कहकर ही नारदजी अंतर्ध्यान हो गए. नारदजी के कथनानुसार राजा ने अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया. राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया.

नोट:-

वाल्व्याससुमनजीमहाराज कहते है कि पूजा के लिए शालिग्राम की मूर्ति को स्थापित करना चाहिए. शालिग्राम की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए और फिर पूजा के दौरान भोग भी लगाना चाहिए. पूजा समाप्त होने पर शालिग्राम के मूर्ति की आरती भी करें और आरती के दौरान कहें ‘हे अच्युत, हे पुंडरीकाक्ष, मैं आपकी शरण हूं, आप मेरी रक्षा कीजिए, मेरे दुखों को दूर कीजिए.

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

वालव्याससुमनजीमहाराज,

महात्मा भवन,श्री रामजानकी मंदिर,

राम कोट, अयोध्या. 8544241710, 8709142129.