Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-06…

...माता सीता-त्रिजटा संवाद...

दोहा :-

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।

मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, इसके बाद राक्षसियाँ जहाँ-तहाँ चली गई और  माता सीताजी मन ही मन  में  सोचने लगी कि एक महीना बीत जाने पर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा.

 चौपाई :-

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोली- हे माता ! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है. हे माता जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मै शरीर छोड़ सकूँ. ये विरह असह्णीय हो चला है, अब यह सहा नही जाता है.

वालव्याससुमनजीमहाराज,

आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।

सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे. हे माता ! फिर उसमे आग लगा दे. हे सयानी ! तू मेरी प्रीति को सत्य कर दे. रावण की शूल के समान दुःख देने वाली वाणी कानो से कौन सुने ?

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।

निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।

महाराजजी श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, सीता जी के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हे समझाते हुए कहा कि प्रभु के प्रताप, बल और सुयश को सुनाया. त्रिजटा ने  कहा –  हे सुकुमारी ! सुनो रात्रि के समय आग नही मिलेगी. ऐसा कहकर वह अपने घर चली गई.

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता सीताजी मन ही मन में कहने लगी – क्या करूँ ! जब विधाता ही विपरीत हो गया. न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी. आकाश मे अंगारे दिखाई दे रहे है, और पृथ्वी पर एक भी तारा नहीं आता.

पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।

सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका ।।

महाराजजी श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता. हे अशोक वृक्षा मेरी विनती सुन. मेरा शोक हर ले और अपना अशोक नाम सत्य कर दे.

नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।

देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता ।।

महाराजजी श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, तेरे नए-नए कोमल पत्ते अग्नि के समान है. अग्नि दे, विरह रोग का अंत मत कर. माता सीताजी को विरह से परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान् जी को कल्प के समान बीता.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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