सपना सपना ही रह गया….

सपना सपना ही रह गया….

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बजट को देखने व सुनने के बाद ऐसा महसूस हुआ की चंद लोगों के लिए ही बजट बनाया गया है बाक़ी तो सिर्फ नाम के हैं. फोटो:-गूगल

पिछले दिनों देश का आर्थिक बजट आया और बजट को देखने व सुनने के बाद ऐसा महसूस हुआ की चंद लोगों के लिए ही बजट बनाया गया है बाक़ी तो सिर्फ नाम के हैं.इस बार के बजट में जुमलों का ही प्रयोग किया गया है, वही वादे जिन्हें फिर से दुहराया गया या यूँ कहें कि, बोतल भी वही मटेरियल भी वही बदल गये सिर्फ नाम. समझ में नहीं आता है कि, देश में पैसा है नहीं और हम लम्बी-लम्बी बाते कर रहे हैं.

पिछले कई सालों से जुमले ही सुनते आ रहें हैं, कई परियोजनाए की घोषणाएं हुई, धरातल पर कितनी उतरी इसका पता नहीं, फिर भी पुरे देशवासी उम्मीद लगा के बैठे है कि, कब मेरा भला होगा? सरकारे आती है और, चलीं जाती है, पर कुछ समस्याएं पहले भी बनी हुई थी, और आज भी बनी हुई है. अगर देखा जाय तो वर्तमान समय में किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है बेरोजगारी… जो हर साल बढती ही जा रही है और अंधे कुएं के ऐसा जिसका ओर या छोड़ का कोई पता नहीं.

माननीय वित्त मंत्री ने अपना बजट पेश करते समय देश के सारे स्वतन्त्रता सेनानियों को भूल गये और उन्हें सिर्फ याद रहे तो सिर्फ “मोदी” आखिर क्यों…? जहां धरा का गुणगान होना चाहिए था, वहां गुणगान किसी और का होता है. वित्त मंत्री ने इस बार चुनावी बजट में किसानों और गरीबों का ही जिक्र किया है. पहले बात करते हैं गरीबों की…? माननीय वित्त मंत्रीजी बता सकते हैं कि आखिर गरीब कौन है….? गरीबी की परिभाषा क्या होनी चाहिए…? क्या मंत्रीजी जाति आधारित गणना को ही गरीब मानते हैं….?

वर्तमान समय में जाति आधारित गरीब इसी बात की ताक में रहते हैं कि, मुफ्त का माल है हजम करो…? और ह्मेशा रोते रहो कि मैं जाति आधारित गरीब हूँ…. सरकार का ध्यान हमारी ओर नहीं है. जब सरकार फ्री में रहने को घर, बिजली, पानी, अनाज और रसोई के लिए गैस चूल्हे और सिलेंडर दे रही है तो काम क्यों करें? दुसरी बात है किसान की. इस बार वित्त मंत्री ने किसानों के हाथ में जुमलों की झुनझुना दे दिया है और सरकार की नजर में किसान खुश हो गये. वित्त मंत्रीजी क्या आप बता सकते है कि, फसल बीमा योजना से आखिर भला किसका होता है… किसानो को या बीमा कंपनियों को…?

वर्तमान सरकार चार सालों से आम जनता के उप्पर कई रिसर्च किये और नतीजा जीरो ही मिला. सालो का सबसे  बड़ा मुद्दा है कालाधन. कालाधन को लेकर सरकार ने पहले नोटबंदी की… आम आवाम ने खुलकर सहयोग किया पर नतीजा शून्य ही मिला, उसके बाद सरकार ने जीएसटी लागू की और जूमला दिया कि, आने वाले समय में चीजे सस्ती होगी पर आम-आवाम इन्तजार में है कि, कब चीजे सस्ती होगी और मंहगाई से मुक्ति मिलेगी लेकिन, आने वाले समय में भी नही महसूस होता है कि, मंहगाई से मुक्ति मिलेगी…?

चार साल पहले जब सरकार आई थी तब सरकार ने नौकरियों की बहाली रोक दी और कहा कि, सरकार 2करोड़ नौकरियों का सृजन करेगी. इसके लिए सरकार ने कौशल विकास योजना का धूम-धाम से शुरू की, लेकिन ट्रेनिंग करने के बाद भी युवा घर बैठकर रोटियां तोड़ रहें है और कौशल विकास परियोजना की धीरे-धीरे हवा निकल गई और आम-आवाम को एक और जूमला दे दिया गया. वर्तमान समय में स्कूल, कॉलेज और तरह-तरह के एजुकेशन सेण्टर तो खुले हैं लेकिन उनमे पढाने वाले शिक्षक ही मौजूद नहीं है फिर भी हर साल लाखों बच्चे डिग्री लेकर सडक पर आ रहे हैं.

सरकार ने शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए एक नई पहल शुरू की है जल्द ही डिग्रीधारी युवा अनुबंध के आधार पर दूर दराज के कालेजों में पढाने जायेंगें. इतनी मेहनत करके अच्छे कालेज में पढ़कर भी नौकरी नही मिलती है और मिलती है बस धोखा….? जब टेक्नीकल की पढाई करके अच्छे जॉब ही नहीं मिलती है तो टेक्नीकल पढाई का क्या फायदा…? वर्तमान समय के माता-पिता की सोच होती है सरकारी नौकरी…लेकिन सरकार के पास नौकरी उपलब्बध ही नहीं है या यूँ कहें कि, सरकार की मंशा ही नहीं है कि आम-आवाम को नौकरी देना… बस उनका एक ही काम है जुमला देना.

हर राज्य में सेक्रेटीयट होती है और हर साल वहां भी पुराने लोग रिटायर हो रहे है और कई पोस्ट खाली भी है लेकिन सरकार नई वैकेंसी की जगह रिटायर कर्मी को ही अनुबंध पर रखकर अपना काम कर रही है और बेरोजगारों को भूल जाती है. हर सरकार का एक ही मुद्दा होता है विकास लेकिन विकास तभी दिख सकता है जब हमारे युवा बेरोजगार को रोजगार उपलब्बध हों तभी विकास को विकास कहेंगें…? लेकिन वर्तमान समय में विकास तो सिर्फ राजनीति का ही मुद्दा होता है जिससे, वो अगले 5 सालों तक जुमले बाजी कर सकें, और आम-आवाम जहां खड़ा था वहां से गहरी खाई में गिर गया इसका पता भी नहीं होता है.

बताते चलें कि, देश में उच्च वर्ग व गरीब के बाद भी इस धरती पर मध्यम वर्ग के लोग भी रहते हैं. मध्यम वर्ग भी दो भागों में विभाजित हो गई है. पहला जो नौकरी करते हैं और दूसरा जो किसी तरह अपना जीवन यापन करते हैं, इसके बाद आते हैं देश के किसान. आजादी के 70 साल गुजर गये लेकिन, ना तो देश में एक कारखाने लगे और ना तो देश का विकास ही हुआ. आखिर 70 सालों से देश की भोली-भाली जनता के साथ छल, धोखा और स्वपन ही दिखाया गया और समस्त देशवासी लोकतंत्र के महापर्व चुनाव में भाग लेते हैं और उन्हें मिलता है तो बस सिर्फ धोखा ही धोखा…?

वर्तमान समय में सरकार को चलाने के लिए मध्यमवर्गीय आवाम ही सहायक होते हैं. देश के सारे कानून भी मध्यमवर्गीय आवाम पर ही लागू होते हैं, अगर मान लिया जाय कि, देश में मध्यमवर्गीय आवाम ना हो तो क्या होगा…? वर्तमान समय में मध्यमवर्गीय आवाम की हालत पतली है फिर भी सरकार 1 प्रतिशत का सेस टैक्स उन पर लगा दिया है. सरकार अपने फायदे के लिए मध्यमवर्गीय आवाम पर टैक्स का अतिरिक्त बोझ दे रही है, महंगाई ने पहले ही मध्यमवर्गीय की कमर तोड़ दी है उसके बाद 1 प्रतिशत का सेस टैक्स का अतिरिक्त बोझ भी डाल दिया है.

वर्तमान समय की एक परिपाट चल गई है कि, गरीब और गरीबी का मजाक बनाओं…? साथ ही बंद वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह तय करते हैं कि, गरीब एक समय का खाना तो 29 रूपये में कर लेता है, अगर इस तथ्य को बाजार का भाव से मिलाने की कोशिस करें तो समझ में आता है कि एक जुमला दिया गया है. वास्तव में 29 रूपये में खाना सिर्फ और सिर्फ संसद के कैंटीन में ही उपलब्बध होता है, जहां आम-आवाम की पहुंच भी नहीं होती है. बताते चलें कि, 29 रूपये का खाना उन लोगों को ही नसीब होता है जिनकी मासिक आय 80 हजार से उप्पर होती है और उनके मासिक आय पर कोई  टैक्स भी नही लगता है.

अगर, हम सभी 5 साल पीछे चलें तो देखते है कि, कालाधन एक बड़ा मुद्दा था और हम सभी  कह सकते हैं कि आज भी है… लेकिन वर्तमान समय में मुद्दे ही मुद्दे है…..? आने वाले समय में चुनाव आने वाली है और ना जाने कितने कितने पुराने मुद्दे गायब हो जायेगें….? और नये चटपटे मुद्दे के सहारे ही लोकतंत्र का महान पर्व सम्पन्न होगा. कुछ ही दिनों पहले ही ऑक्सफेम की रिपोर्ट पर ध्यान दे दें, तो साफ़-साफ़ समझ में आता है कि, गरीबी और अमीरी की खाई के बीच में पिस रहा है बेचारा मध्यमवर्गीय.

एक स्वप्न मध्यमवर्गीयों ने देखा था… साथ ही उम्मीद थी कि, सरकार के आखरी बजट के पिटारे में कुछ तो निकलेगा… लेकिन 1 प्रतिशत का सेस और कंधे पर डाल दिया, चुकी इसी सेस के बहाने उनकी नैया पार कर जाय.