वैदिक सभ्यता…

वैदिक सभ्यता…

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स्तुति मन्त्रों का संकलन है ऋग्वेद. इस मंडल में विभक्त 1017 सूक्त हैं. फोटो:-गूगल.

                 ऋग्वैदिक काल -1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.

वैदिक सभ्यता का श्रोत वेदों से है और इसके संस्थापक आर्य थे. इनका आरम्भिक जीवन पशुचारण था. आर्यों ने ही ऋग्वेद की रचना की जो मानव समुदाय का पहला ग्रंथ माना जाता है. ऋग्वेद में कई देवताओं की स्तुतियाँ संग्रहित है जैसे इंद्र, अग्नि, वरुण. ऋग्वेद द्वारा जिस काल का विवरण प्राप्त होता है उसे ऋगवैदिक काल कहा जाता है.

कहा जाता है कि, आर्यों का भारत आगमन लगभग 1500 ई०पू० के आस-पास हुआ था लेकिन, इसका कोई ठोस प्रमाण उपलब्बध नहीं है. बताते चलें कि, अधिकांश विद्वान् प्रो. मैक्समूलर के विचारों से सहमत हैं कि आर्य मूल रूप से मध्य एशिया के निवासी थे. भारत में आर्य सर्वप्रथम सप्तसैंधव प्रदेश में आकर बसे थे और इस प्रदेश में बहने वाली नदियों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. इस काल की सबसे प्रमुख नदी सिन्धु का जिक्र कई बार किया गया है यमुना का तीन बार और गंगा का एक बार किया गया है.

ऋग्वेद काल की सबसे पवित्र नदी सरस्वती थी और इसे ‘नदीतमा’ यानी नदियों का प्रमुख भी कहा गया है. कहा जाता है कि, सप्तसैंधव प्रदेश के बाद आर्यों ने निकट के प्रदेशों पर कब्जा कर लिया और उस क्षेत्र को ‘ब्रह्मावर्त’ कहा जाने लगा. यह क्षेत्र सरस्वती व दृशद्वती (घग्घर) नदियों के बीच पड़ता है. गंगा एवं यमुना के दोआब क्षेत्र एवं उसके सीमावर्ती क्षेत्रो पर भी आर्यों ने कब्ज़ा कर लिया, जिसे ‘ब्रह्मर्षि देश’ कहा गया. आर्यों ने हिमालय और विन्ध्याचल पर्वतों के बीच के क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया और उस क्षेत्र का नाम ‘मध्य देश’ रखा. कालांतर में आर्यों ने सम्पूर्ण उत्तर भारत में विस्तार कर लिया, जिसे ‘आर्यावर्त’ कहा जाता था.

कहा जाता है कि, भौगोलिक विस्तार के दौरान आर्यों को भारत के मूल निवासियों, जिन्हें अनार्य कहा गया है उनसे संघर्ष भी करना पड़ा. दशराज्ञ युद्ध में प्रत्येक पक्ष में आर्य एवं अनार्य थे और ईसका उल्लेख ऋग्वेद के 10वें मंडल में मिलता है. यह युद्ध रावी (पुरुष्णी) नदी के किनारे लड़ा गया, जिसमे भारतीय काबिले के प्रमुख  राजा सुदास ने अपने प्रतिद्वंदियों को पराजित कर, भारत कुल की श्रेष्ठता स्थापित की.

ऋग्वेद में आर्यों के पांच कबीलों का उल्लेख मिलता है- पुरु, युद्ध, तुर्वसु, अजु, प्रह्यु. जिन्हें ‘पंचजन’ कहा जाता था.

ऋग्वैदिक काल की राजनीतिक व्यवस्था, कबीलाई थी. इस काल में लोग जनों या कबीलों में विभाजित थे. प्रत्येक कबीले का एक राजा होता था, जिसे ‘गोप’ कहा जाता था.राजा को कबीले का संरक्षक और नगरों पर विजय प्राप्त करने वाला कहा जाता था. राजा के कुछ सहयोगी दैनिक प्रशासन में उसकी सहायता करते थे जैसे- सेनापति, पुरोहित, ग्रामजी, पुरुष, स्पर्श, दूत और शासकीय पदाधिकारी आदि. शासकीय पदाधिकारी राजा के प्रति उत्तरदायी होते थे चुकिं, इनकी नियुक्ति तथा निलंबन का अधिकार राजा के हाथों में होता था.

ऋग्वेद में सभा, समिति, विदथ जैसी अनेक परिषदों का भी उल्लेख मिलता है. इस काल में महिलाएं भी राजनीती में भाग लेती थीं. सभा एवं विदथ परिषदों में भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी होती थी. सभा श्रेष्ठ एवं अभिजात्य लोगों की संस्था मानी जाती थी.समिति केन्द्रीय राजनितिक संस्था होती थी.समिति की नियुक्ति व पदच्युत करने और नियंत्रण रखने का अधिकार राजा के हाथों होता था. समिति समस्त प्रजा की संस्था होती थी.

ऋग्वेद में न्याय व्यवस्था के विषय में बहुत ही कम जानकारी मिलती है. इस काल में न्याय व्यवस्था राजा और पुरोहित के हाथों होती थी और इन्हें ‘प्रश्नविनाक’ कहा जाता था. न्याय वयवस्था वर्ग पर आधारित होती थी. हत्या जैसे संगीन अपराधों के लिए 100 ग्रंथों का दान अनिवार्य था. ऋग्वैदिक काल में राजा भूमि (जमीन) का मालिक नहीं होता था बल्कि भूमि (जमीन) का मालिक जनता के हाथों में होती थी. ग्राम, विश, और जन शासन की इकाई थे.ग्राम कई परिवारों का समूह होता था जबकि, विश कई गावों का समूह होता था और अनेक विशों का समूह ‘जन’ होता था.विदथ आर्यों की प्राचीन संस्था थी.

ऋग्वैदिक काल में समाज पितृसत्तात्मक था पिता ही  सम्पूर्ण परिवार, भूमि संपत्ति का अधिकारी होता था. पितृ -सत्तात्मक समाज के होते हुए भी इस काल में महिलाओं का यथोचित सम्मान प्राप्त होता था. और इस काल की महिलाएं भी शिक्षित होती थीं.प्रारंभ में ऋग्वैदिक समाज दो वर्गों आर्यों एवं अनार्यों में विभाजित था.किन्तु कालांतर में ऋग्वेद के दशम मंडल में पुरुष सूक्त  पाए गए, और समाज चार वर्गों -ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित हो गया. इस काल में संयुक्त परिवार का प्रथा प्रचलन में थी.

विवाह व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन का प्रमुख अंग होता था. इस काल में अंतरजातीय विवाह होता था परन्तु, बाल विवाह का निषेध था जबकि, विधवा विवाह की प्रथा प्रचलन में थी. इस काल में सती व पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था.जीवन भर अविवाहित रहने वाली लड़कियों को ‘अमाजू कहा जाता था.पुत्र प्राप्ति के लिए नियोग की प्रथा का प्रचलन था.इस काल में दास प्रथा का प्रचालन था.

आर्य शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे. उनके वस्त्र सूत, ऊन तथा मृग-चर्म के बने होते थे.ऋग्वैदिक काल में लोगों में नशीले पेय पदार्थों में सोम और सुरा प्रचलित थे. मृतकों को प्रायः अग्नि में जलाया जाता था, लेकिन कभी-कभी दफनाया भी जाता था.

ऋग्वैदिक काल में धर्म की सबसे बड़ी विशेषता थी  इसका व्यवसायिक और उपयोगितावादी स्वरुप था. इस काल में एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे जबकि, आर्यों का धर्म बहुदेववादी था. वे प्राकृतिक भक्तियों-वायु, जल, वर्षा, बादल, अग्नि और सूर्य आदि की उपासना किया करते थे. इस काल में लोग अपनी भौतिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए यज्ञ और अनुष्ठान के माध्यम से प्रकृति का आह्वान करते थे.

ऋग्वेद में देवताओं की संख्या 33 कोटि बताई गयी है.आर्यों के प्रमुख देवताओं में इंद्र, अग्नि, रूद्र, मरुत, सोम और सूर्य शामिल थे. इस काल के महत्वपूर्ण देवता इंद्र माने जाते थे और इन्हें युद्ध और वर्षा दोनों का देवता  जाता है. इसका वर्णन ऋग्वेद के 250वें सूक्तों में मिलता है. इन्द्र के बाद दुसरे देवता का स्थान अग्नि का था. इनका मुख्य कार्य मनुष्य एवं देवता के बीच मध्यस्थ स्थापित करना था.इसका वर्णन ऋग्वेद के 200वें सूक्त में मिलता है. देवताओं में तीसरा स्थान प्राप्त था वरुण का और इन्हें जल का देवता माना जाता था. ऋग्वेद में शिव को ‘त्रयम्बक’ कहा गया है. इस काल में मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं मिलता है.

ऋग्वैदिक काल के अन्य देवताओं में….

  • आकाश के देवता :- सूर्य, घौस, मिस्र, पूषण, विष्णु, ऊषा और सविष्ह.
  • अंतरिक्ष के देवता :- इन्द्र, मरुत, रूद्र और वायु.
  • पृथ्वी के देवता :- अग्नि, सोम, पृथ्वी, वृहस्पति और सरस्वती.
  • पूषण ऋग्वैदिक काल में पशुओं के देवता थे, जो उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के देवता बन गए.
  • ऋग्वैदिक काल में जंगल की देवी को ‘अरण्यानी’ कहा जाता था.
  • ऋग्वेद में ऊषा, अदिति, सूर्या आदि देवियों का भी उल्लेख मिलता है.
  • प्रसिद्द गायत्री मन्त्र, जो सूर्य से सम्बंधित ‘देवी सावित्री’ को संबोधित किया गया है, सर्वप्रथम ऋग्वेद में ‘देवी सावित्री’ का ही जिक्र किया गया है.

ऋग्वैदिक काल की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि और पशुपालन था. इस काल के लोगों की मुख्य सम्पत्ति ‘गाय’ थी. इस काल में गेंहूँ की खेती की जाती थी. इस काल में ‘हल’ को लांगल अथवा ‘सीर’ शब्द का प्रयोग करते थे. सिंचाई का कार्य नाहर (नहर) से लिए जाता था. ऋग्वेद में ‘नाहर’ शब्द के लिए ‘कुल्या’ शब्द का प्रयोग मिलता है.उपजाऊ भूमि को ‘उर्वरा’ कहा जाता था.ऋग्वेद के चौथे मंडल में सम्पूर्ण मन्त्र कृषि कार्यों से सम्बद्ध होती थी.

ऋग्वेद के ‘गव्य’ एवं ‘गव्यपति’ शब्द चारागाह के लिए प्रयुक्त होता था. भूमि (जमीन) निजी संपत्ति नहीं होती थी बल्कि, उस पर सामूहिक अधिकार होता था.घोडा आर्यों का अति उपयोगी पशु होता था.आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था और वे गाय, बैल, भैंस घोड़े और बकरी आदि पालते थे.

ऋग्वैदिक काल में वाणिज्य-व्यापार पर पणियों का एकाधिकार था. व्यापार स्थल और जल मार्ग दोनों से होता था. सूदखोर को ‘वेकनाट’ कहा जाता था. क्रय विक्रय के लिए विनिमय प्रणाली का अविर्भाव हो चुका था. गाय और निष्क विनिमय के साधन माने जाते थे. ऋग्वेद में नगरों का उल्लेख नहीं मिलता है. इस काल में सोना तांबा और कांसा धातुओं का प्रयोग होता था. ऋण लेने व बलि देने की प्रथा प्रचलित थी, जिसे ‘कुसीद’ कहा जाता था.

ऋग्वेद में बढ़ई, सथकार, बुनकर, चर्मकार, कुम्हार, आदि कारीगरों के उल्लेख मिलता है. तांबे या कांसे के अर्थ में ‘आपस’ का प्रयोग यह संकेत करता है कि धातु एक कर्म उद्योग था. ऋग्वेद में वैद्य के लिए ‘भीषक’ शब्द का प्रयोग मिलता है.‘करघा’ को ‘तसर’ कहा जाता था. बढ़ई के लिए ‘तसण’ शब्द का उल्लेख मिलता है. मिटटी के बर्तन बनाने का कार्य एक व्यवसाय होता था.

जब आर्य भारत में आये, तब वे तीन श्रेणियों में विभाजित थे – योद्धा, पुरोहित और सामान्य. जन आर्यों का प्रारंभिक विभाजन था. शुद्रो के चौथे वर्ग का उद्भव ऋग्वैदिक काल के अंतिम दौर में हुआ था. इस काल में राजा की कोई नियमित सेना नहीं होती  थी. युद्ध के समय संगठित की गयी सेना को ‘नागरिक सेना’ कहा जाता था.ऋग्वेद में किसी परिवार का एक सदस्य कहता है कि मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं और माता चक्की चलने वाली है. यानी भिन्न-भिन्न व्यवसायों से जीवकोपार्जन करते हुए हम एक साथ रहते हैं.‘हिरव्य’ एवं ‘निष्क’ शब्द का प्रयोग स्वर्ण के लिए किया जाता था. इनका उपयोग द्रव्य के रूप में भी किया जाता था. ऋग्वेद में ‘अनस’ शब्द का प्रयोग बैलगाड़ी के लिए किया जाता था. ऋग्वैदिक काल में दो अमूर्त देवता थे, जिन्हें श्रद्धा और मनु कहा जाता था. वैदिक लोगों ने सर्वप्रथ तांबे की धातु का इस्तेमाल किया था.

ऋग्वेद में सोम देवता के बारे में सर्वाधिक उल्लेख मिलता है जबकि, अग्नि को अथिति कहा गया है क्योंकि मातरिश्वन उन्हें स्वर्ग से धरती पर लाया था. यज्ञों का संपादन कार्य ‘ऋद्विज’ करते थे. इनके चार प्रकार थे – होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्म. संतान की ईच्छुक महिलाएं ‘नियोग प्रथा’ का वरण करती थीं, जिसके अंतर्गत उन्हें अपने देवर के साथ सहचर्य स्थापित करना पड़ता था.‘पणि’ व्यापार के साथ-साथ मवेशियों की भी चोरी करते थे. इसीलिए, उन्हें आर्यों का शत्रु माना जाता था.

स्तुति मन्त्रों का संकलन है ऋग्वेद। इस मंडल में विभक्त 1017 सूक्त हैं. इन सूत्रों में 11 बालखिल्य सूत्रों को जोड़ देने पर कुल सूक्तों की संख्या 1028 हो जाती है. दशराज्ञ युद्ध का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है. यह ऋग्वेद की प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना मानी जाती है. ऋग्वेद में 02 से 07 मण्डलों की रचना हुई, जो गुल्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अभि, भारद्वाज और वशिष्ठ ऋषियों के नामों से है. ऋग्वेद का नाम मंडल पूरी तरह से सोम को समर्पित माना जाता है. पहले एवं दसवें मण्डल की रचना संभवतः सबसे बाद में की गयी है इन्हें ‘सतर्चिन’ कहा जाता है. गायत्री मंत्र ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में है.10वें मंडल में मृत्यु सूक्त है, जिसमे विधवा के लिए विलाप का वर्णन मिलता है. ऋग्वेद के दसवें मण्डल के 95वें सूक्त में पुरुरवा,ऐल और उर्वशी बुह संवाद भी है. ऋग्वेद के नदी सूक्त में व्यास (विपाशा) नदी को ‘परिगणित’ नदी कहा गया है.