विजया एकादशी…

विजया एकादशी…

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इस एकादशी के व्रत से आप निश्चित ही समुद्र को पार कर रावण को पराजित कर देंगे.

सत्संग के दौरान एक भक्त ने महाराज जी पूछा कि, महाराजजी फाल्गुन महीने में जो एकादशी होती है उसके बड़े ही महात्यम है. सुना है कि, महाराजजी इस एकादशी को बड़े-बड़े राजा-महाराजा किया करते थे. वालव्याससुमनजीमहाराज कहते है कि जिस तरह से माघ का महिना पवित्र और पावन होता है उसी तरह फाल्गुन का महीना भी पावन और पवित्र होता है. हर महीने में दो एकादशी होती है, इस समय फाल्गुन कृषण पक्ष चल रहा है और इस समय जो एकादशी है उसे विजया एकादशी कहते हैं. त्रेता युग में भगवान रामचन्द्र ने इस एकादशी को करने के बाद ही लंका पर चढाई की और विजय की प्राप्ति हुई. महाराजजी कहते हैं कि, इस एकादशी के बारे में एक बार अर्जुन ने माधव से पूछा कि, हे अचुत्य, हे मुरारी फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी का महात्यम आपसे जानना चाहता हूँ.

महाराजजी कहते हैं कि, अर्जुन के इस प्रकार अनुनय पूर्वक प्रश्न करने पर भगवान गोविन्द बड़े ही प्रसन्न हुए और भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा… हे अर्जुन इस एकादशी को करने वाला हमेशा विजयी रहता है. हे अर्जुन तुम हमारे प्रिय सखा (दोस्त) हो, इसलिय ही यह कथा और इसके करने की विधि बता रहा हूँ, इससे पहले देवर्षि नारद ने भगवान ब्रह्मा से इस कथा को सुना था.

व्रत विधि :-

एकादशी के पूर्व दशमी को रात्री में एक बार ही भोजन करना आवाश्यक है उसके बाद दुसरे दिन सुबह उठ कर स्नान आदि कार्यो से निवृत होने के बाद व्रत का संकल्प भगवान विष्णु के सामने संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना करें. भगवान विष्णु की पूजा के लिए धूप, दीप, फल और पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए. भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए विधिपूर्वक पूजन करें. ध्यान दें…. एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणो को अन्न दान, जनेऊ व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

पूजन सामाग्री :-

वेदी, कलश, सप्तधान, पंच-पल्लव, रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल,  दूध,  दही,  गाय के घी का दीपक, सुपाड़ी, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, नीबूं, नवैध, केला और तुलसी पत्र व मंजरी.

कथा :-

त्रेतायुग की बात है भगवान श्री रामचन्द्र जी जो भगवान विष्णु के अंशावतार थे अपनी पत्नी सीता को ढूंढते हुए सागर तट पर पहुंचे. सागर तट पर भगवान का परम भक्त जटायु नामक पक्षी रहता था. उस पक्षी ने बताया कि, सीता माता को सागर के पार लंका नगरी का राजा रावण ले गया है और, माता इस समय आशोक वाटिका में हैं. जटायु द्वारा सीता का पता जानकर श्रीरामचन्द्र जी अपनी वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण की तैयारी करने लगे, परंतु सागर के जल जीवों से भरे दुर्गम मार्ग से होकर लंका पहुंचना  बहुत  ही कठिन था.

भगवान श्री राम इस अवतार में मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में दुनिया के सामने उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते थे, अत: आम आदमी की भांति चिंतित हो गये. जब उन्हें सागर पार जाने का कोई मार्ग नहीं मिल रहा था तब, उन्होंने लक्ष्मण से पूछा, कि हे लक्ष्मण इस सागर को पार करने का कोई उपाय मुझे सूझ नहीं रहा है, अगर तुम्हारे पास कोई उपाय है तो बताओ? श्री रामचन्द्र जी की बात सुनकर लक्ष्मण बोले प्रभु आपसे तो कोई भी बात छिपी नहीं है, आप स्वयं सर्वसामर्थवान है, फिर भी मैं कहूंगा कि यहां से आधा योजन दूर परम ज्ञानी वकदाल्भ्य मुनि का निवास हैं हमें, उनसे ही इसका हल पूछना चाहिए.

भगवान श्रीराम लक्ष्मण समेत वकदाल्भ्य मुनि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें प्रणाम करके अपना प्रश्न उनके सामने रखा. मुनिवर ने कहा, हे राम, आप अपनी सेना समेत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें, इस एकादशी के व्रत से आप निश्चित ही समुद्र को पार कर रावण को पराजित कर देंगे. श्री रामचन्द्र जी ने तब उक्त तिथि के आने पर अपनी सेना समेत मुनिवर के बताये विधान के अनुसार एकादशी का व्रत रखा और सागर पर पुल का निर्माण कर लंका पर चढ़ाई की. जिसके बाद राम और रावण का युद्ध हुआ जिसमें रावण मारा गया और लंका पर विजय हासिल की.

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्रीरामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.