विचार…

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फोटो:-गूगल

समय का पहिया बड़ी ही तेजी से आगे बढ़ रहा है, आधुनिकता हीं नहीं टेक्नोलोजी कहें तो ज्यदा अच्छा लगता है. ग्लोबलाइजेशन के दौर में भारत अपना परचम लहराते हुए आगे की ओर अग्रसर है लेकिन, जिन्दगीं ही पीछे छुट गई. वर्तमान समय के भारत में एक अंधी दौड़ लगी है और आवाम आँख बंद किये उस दौड़ में शामिल हो गये हैं या यूँ कहें शामिल होते जा रहें हैं. हर तरफ हठधर्मिता भी बढती ही जा रही है साथ ही एक अंधी हवस की आग में जल रहा है या जलाया जा रहा है? देश की आवाम पहले के ही भाँती सोई हुई है. आजादी के बाद के भारत में अशिक्षा व गरीबी मुख्य मुद्दा रहा है साथ ही कुछ सामजिक कुरीतियाँ जो आजादी के पहले और बाद में भी वर्तमान समय तक चल रही है. एक तरफ देश का बच्चा, युवा, प्रौढ़ व वृद्ध सभी लोग माँ के विभिन्न रूपों की पूजा-अराधना करते हैं…. तो वहीं दूसरी तरफ जीती-जागती माँ के विभिन्न रूपों पर तरह-तरह से अत्याचार भी करते हैं, जिसके सुनने व देखने के बाद रूह कांप जाती है.

इंटरनेट की आम पहुंच भारतीय अस्मिता और संस्कृति को गहरा आघात दे रही है. वर्तमान समय में आजादी की अभिव्यक्ति किसी ख़ास वर्ग के अस्मिता को ताड़-ताड़ कर रही है और आवाम सो रही है. जिस देश की महिलाएं क्षत्राणी हुआ करती थी… वर्तमान समय में उन्हें पैदा होने से पहले या पैदा होने के बाद मार दिया जाता है…. या ताउम्र उन्हें प्रताड़ित किया जाता है. समय का पहिया जिस तरह से आगे बढ़ रहा है ठीक उसके विपरीत मानवीय संवेदनाओं का भी अंत हो रहा है. सरकारें अपनी ही कुर्सी बचाने के चक्कर में साल दर साल गुजर जाती है लेकिन कुर्सी का खेल नहीं रुकता है. पहले जनता के सेवक खे जाने वाले सेवक वर्तमान समय के आधुनिक भगवान हो गये हैं.

इतिहास में महिला वीरांगनाओं का जिक्र बड़े ही फक्र से किया जाता है ठीक उसके विपरीत आज के जनसेवक हो गये है. इतिहास गवाह है कि इस देश के महिलाओं की वीर गाथाएं आज भी स्वर्णिम पन्नो पर लिखी है पर वर्तमान समय की यह स्थिति है कि महिलाएं या लडकियाँ सिर्फ और सिर्फ उपभोग की वस्तु बन कर रह गई है. इस देश की महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर देश, समाज और परिवार का सेवन कर रही है फिर भी आज की महिलाएं सिर्फ और सिर्फ उपभोग की वस्तु बन कर रह गई है. जिस देश में हर एक कण में भगवान दिखाई पड़ते है आज उसी देश के कण-कण में महिलाओं, लडकियों और बच्चियों को अपनी इज्जत और जान बचाने के लिए अपने ही लोगों से दुहाई देनी पद रही है… फिर भी उनकी इज्जत और जान जा रही है.

देश के इतिहास में 21वीं सदी के कारनामे स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जायेंगें. मानव अपनी हठधर्मिता के कारण अपने ही समाज के अंत करने पर तुली है. हर साल की तरह इस साल भी माँ भवानी की अराधना बड़े ही धूम-धाम से करेंगे लेकिन, अपने ही घर या समाज की माँ, बहन और बेटियों के अस्मिता को ताड-ताड कर देंगें. एक समय हुआ करता था…. जब कभी इस तरह की घटनाएँ कभी-कभी अखबार के पन्नों में दिख जाया करती थी लेकिन समय का पहिया जिस तेजी से घुमा है उससे दोगुने नहीं-नहीं चार गुने या उससे भी अधिक तेजी से महिलाओं, लडकियों, बच्चियों व दुधमुहीं बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार, मानसिक उत्पीडन और यौनाचार की घटनाओं में तेजी से बृद्धि हुई है. इस तरह की घटनाओं की जिम्मेदारी सिर्फ पुरुष वर्ग की ही नहीं हमारे बुजुर्गों पर भी होती है लेकिन, इस तरह की घटानाओं की जिम्मेदारी महिलाओं के माथे मढ़ कर इतिश्री कर लेते है या पीडिता के परिवार को मानसिक उत्पीडन कर मरने को विवश कर देते हैं.

हाल के दिनों में गैंगरेप की घटानाओं में तेजी से वृद्धि हुई है. देश के गली-गली में शायद ही ऐसी कोई जगह बची होगी जहां किसी महिला के साथ छेड़-छाड़ की घटना नहीं हुई होगी. भारतीय समाज में मानव जीवन के चार चरण हैं और उन चार चरणों का अपना ही अलग महत्व है लेकिन, पश्चमी सभ्यता में ऐसा कुछ भी नहीं है. आज भी भारत के युवा शादि-विवाह से पहले सेक्स को गलत कहा जाता है लेकिन पश्चमी सभ्यता में खुलेआम है. लेखक की सोच के अनुसार, इंटरनेट को अगर देखा जाय तो खराब नहीं है लेकिन इसका गलत प्रयोग समाज और देश के लिए बड़ा भी भयंकर साबित होगा. जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज भारत देश में देखने को मिल रही है.

जिस देश के बच्चों और युवाओं के हाथों में किताबें होनी चाहिए थी लेकिन, आज के बच्चों और युवाओं दिन हो या रात, महीने हो या साल पढाई को छोड़कर सोशल साईट पर व्यस्त है. वर्तमान समय के भारत देश में बुजुर्ग देश चला रहे है और युवा व बच्चे सोसल साईट पर …. वर्तमान समय का भारत अपनी तुलना कई देशों से करता है लेकिन, जिन बातों पर तुलना करनी चाहिए वहां कोई ध्यान नहीं देता है और बड़ी-बड़ी बातों में समय का पहिया घूम जाता है. कुछ दिन पहले की ही बात है पीएम ने हाई लेवल की मीटिंग की और ब्ल्त्कारियों के लिए फांसी की सजा हो इसके लिए अध्यादेश जारी किया गया. उसके एक सप्ताह के भीतर ही राष्ट्रपति ने भी मुहर लगा दी. लेकिन उसके बाद भी माँ, बहन, बेटियां और दुधमुहीं बच्चियों के साथ घृणित कर्म किये जा रहें है और आवाम मूकदर्शक की भाँती इस घृणित कर्म का आनंद ले रहें है.