वर्षा ऋतू में प्रदूषित जल से उत्पन्न रोगों की आयुर्वेदिक चिकित्सा…

वर्षा ऋतू में प्रदूषित जल से उत्पन्न रोगों की आयुर्वेदिक चिकित्सा…

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अधिक समय तक दूषित जल का प्रयोग किया जाता है तो शरीर की पाचन क्रिया को विकृत करता है. फोटो:- गूगल .

वर्षा की रिमझिम फुहारों में भींगकर गर्मी से मुक्ति मिलती है. वहीं बारिश के दूषित जल के सेवन से शरीर को अनेको रोग घेर लेते हैं. वर्षा ऋतू में नदियों व तलाबों का जल दूषित हो जाता है. उस जल के सेवन करने से स्त्री, पुरुष, बच्चे व पौढ़ सभी को पीलिया, अतिसार, हैजा, प्रवाहिका. आन्त्रिकज्वर और आंत्रशोध आदि रोगों की विकृति होती है. वर्षा ऋतू में हैण्ड-पम्प और कुओं का भी जल प्रदूषित होता है चुकि, दूषित जल जमीन से रिसकर कुओं व हैंडपम्प का भी जल को प्रदूषित कर देता है. इन दूषित जल का प्रयोग आमतौर पर खान-पान में प्रयुक्त किया जाता है या यूँ कहें कि, दूषित जल का प्रयोग करने से खान-पीने की वस्तुओं में दूषित जल का कुछ अंश रह जाता है, अत: बारिश के मौसम में जल (पानी) को उबाल कर प्रयोग में लाना चाहिए. जब अधिक समय तक दूषित जल का प्रयोग किया जाता है तो शरीर की पाचन क्रिया को  विकृत करता है.यकृत के विकृत होने से शरीर में पीले रंग के तत्व विलरुबीन की मात्रा रक्त के प्रवाह को तीव्र कर देती है, जिसके कारण शरीर का रंग पीला होने लगता है.

शरीर के पीले होने को कामला (पीलिया) कहा जात है.यदि पीलिया रोग की चिकित्सा में विलम्ब किया जाय और भोजन में लापरवाही की जाए तो पीलिया प्राणघातक रूप धारण कर सकता है. यकृत से पित्त पित्त नालिका द्वारा चलकर पित्राश्य से समय-समय पर पहुंचता है. पित्राश्य से समय-समय पर पित्त निकल कर आंतों में पहुंच कर भोजन की पाचन क्रिय में भाग लेता है. पीलिया कई प्रकार का होता है. हेमोलाईटिक जाँडिस रोगिस में खत में लाल कणों के टूटने की गति बढ़ जाती है. नवजात शिशु का यकृत प्रारंभ में पित्त को निष्कासित नहीं कर पाता है और शिशु पीलिया का शिकार बन जाता है. दूसरे प्रकार का पीलिया इन्फेक्टिव जाँडिस होता है. इस पीलिया की उत्पत्ति जीवाणुओं के यकृत पर संक्रमण से होती है. इसमें हेपेटाइटीस “ए”, “बी” और “सी” शामिल होता है. विशेषज्ञों के अनुसार प्रदूषित जल के सेवन से  हेपेटाइटीस “ए” और “ई” तरह का होता है. बारिश के मौसम में जल प्रदूषण से हेपेटाइटीस की विकृति होती है.

पीलिया की आयुर्वेदिक चिकित्सा:-

  1. कामलाहर रस की 1-1 गोली दिन में तीन बार मक्खन निकालने वक्त (मट्ठे) के साथ सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है.
  2. प्राण वल्लभ रस 125 मिलीग्राम मात्रा में दिन में दो बार मधु के साथ सेवन कराने से पीलिया रोग नष्ट होता है.
  3. प्लीहान्त्क चूर्ण 1-1 ग्राम मात्रा में दिन में दिन में दो बार मधु या कुटकी के क्वाथ के साथ सेवन करने पीलिया का प्रकोप नष्ट होता है.
  4. कामलांतक लौह – 500 मिलीग्राम,
  • नवायक्ष लौह – 250 मिलीग्राम ,
  • मंडूर भस्म – 250मिलीग्राम,
  • वृ लोकनाथरस- 250 मिलीग्राम,
  • गिलोय सत्व- 500 मिलीग्राम.

मिश्रित मात्रा 30 पुड़िया बनाकर.

  • कालमेघासव :- सुबह- शाम मुली के रस तथा मधु से
  • लौहासव :- दोनों में से 04-04 चम्मच दवा, सुबह-शाम भोजन के बाद

आंत्रशोध की विकृति:-

वर्षा के मौसम में जल प्रदूषित हो जाने से व दूषित भोजन का सेवन करने से आंत्रशोध की बहुत विकृति होती है. दूषित जल के साथ जीवाणु शरीर में पहुंच कर, आंतों पर संक्रमण करके आंतों में वर्ण बनाकर आंत्रशोध की उत्पत्ति करते हैं. आंत्रशोध में रोगी को कुछ खाते-पीते ही आंतो में तीव्र जलन व शूल होने लगता है. आंतो में व्रण बन जाता है पर मल के साथ रक्त भी निकलने लगता है. आंत्रशोध के चलते रोगी बहुत निर्बल हो जाता है.

आंत्रशोध की आयुर्वेदिक चिकित्सा…

  1. रस पर्पटी :-  125 मिलीग्राम
  • ग्रहणीकपाट वटी  :- 125 मिलीग्राम
  • कुटज चूर्ण      :- 01 ग्राम

मिश्रित मात्रा सुबह- शाम मध के साथ.

  1. अतीस, हींग, काला नमक, वच और त्रिकटु बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बनाएं.

प्रवाहिका की विकृति :-

बारिश के मौसम में जल दूषित ही नहीं होता उस जल में अनेक जीवाणु मिल जाते हैं. जीवाणुओं के कारण प्रवाहिका की विकृती होती है. प्रवाहिका में शौच के साथ आंव निकलती है. पेट में तीव्र ऐंठन होती है, मरोड़ मारती है. रोगी को शूल से बेचैन हो जाता है.

एमीबिक प्रवाहिका की विकृती एन्टीमिवा हिस्टोलिटिका नामक जीवाणुओं से होती है. जीवाणु आंतों में पहुंचकर व्रण बना देता है. एमीबिक प्रवाहिका में शौच के साथ रक्त भी निकलता है.

वेसिलरी प्रवाहिका नदियों, कुओं व तालाबों का दूषित जल पीने से होता है. बारिश के मौसम में मक्खियां भी खाद्य पदार्थों को दूषित बना देती है. वेसिलरी प्रवाहिका में पेट में तीव्र शूल होता है. बार-बार शौच जाने से शरीर में जल की कमी हो जाती है जिससे रोगी को बहुत तेज प्यास लगती है.

प्रवाहिका की चिकित्सा…

1.पंचामृत पर्पटी             :- 125 मिलीग्राम

  • कर्पुर रस                :- 125 मिलीग्राम

मिश्रित मात्रा सुबह- शाम मध के साथ.

  1. हिंग्वाष्टक चूर्ण            :-  60 ग्राम
  • गंगाधर चूर्ण             :-  60 ग्राम
  • इस्बेल चूर्ण             :-  60 ग्राम
  • शतपुष्पादि चूर्ण    :-   60 ग्राम

मिश्रित मात्रा एक-एक चम्मच सुबह-शाम पानी से.

  1. क्लोरोडीन :-  08-10 बूंद दवा आधा कप पानी में तीन बार.
  2. कुट्जारिष्ट :- 04-04 चम्मच सुबह-शाम पानी से.

पथ्य:-   बेल, दही-चुडा, गुल्लर व नेनुआ की सब्जी.

निषेध:-  दाल, दूध व मछली.

वात रोगों की विकृति :-

बारिश के मौसम में वात रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है.शीतल वातावरण होने से संधिवात के कारण जोड़ों का दर्द बहुत पीड़ित करता है, दर्द का प्रकोप रोगी को रात को सोने नहीं देता है. बारिश के मौसम में आमवात, वातरक्त, अर्दित, पक्षाघात आदि के वात रोगों की विशेष उत्पत्ति होती है.

वात रोगों की आयुर्वेदिक चिकित्सा…

1.करास्कर योग                     :-  150 मिलीग्राम

वृहतवात चिंतामणिरस               :-  125 मिलीग्राम

वात गजेन्द्रसिंह रस                 :-  125 मिलीग्राम

सुबह- शाम मधु से.

  1. वातान्तक रस और पंचामृत लौह गुगुल (दोनों में से दो-दो गोली सुबह-शाम )
  2. तरुणीकुसमाकर चूर्ण :- 01 चम्मच रात्री में पानी से

पथ्य  :- लहसुन, भुजा इत्यादि.

निषेध :- दही, पक्का केला.

 

डा० विनोद कुमार उपाध्याय.

चिकित्सा पदाधिकारी,

दयानंद आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल,

सीवान,(बिहार)

ध्रुव आयुर्वेद केंद्र,चित्रगुप्त नगर, (पटना).