राज्यपाल ने शोध को बढ़ावा देने हेतु आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन किया…

राज्यपाल ने शोध को बढ़ावा देने हेतु आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन किया…

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लार्ड मैकाले की पाश्चात्य शिक्षा-व्यवस्था की जगह हमें अपनी जड़ों में ही जीवंत तत्वों की खोज कर समाधान के मार्ग-तलाशने होंगे. फोटो:-आईपीआरडी, पटना.

बुधवार को पटना स्थित ‘लेमन-ट्री-प्रीमियर’ के सभागार में राजभवन के सौजन्य से तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा संयोजित ‘बिहार के विश्वविद्यालयों में शोध को बढ़ावा देने हेतु संवेदीकरण कार्यशाला’ को महामहिम राज्यपाल लाल जी टंडन ने संबोधित करते हुए कहा कि, ‘‘उच्च शिक्षा के विकास एवं इसमें सुधार के प्रयासों को तेज करने के लिए हमें भारतीय संस्कृति की मूल जड़ों में सन्निहित विचार-सम्पदा के आलोक में ही रास्ते तलाशने होंगे. भौतिकतावद के युग में विकसित हुई अपसंस्कृति के दुष्प्रभावों से अपनी शिक्षा-पद्धति को बचाते हुए ही हमें नये भारत का निर्माण करना होगा”.

कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए राज्यपाल टंडन ने कहा कि शिक्षा में शोधपरकता को विकसित करना नितान्त आवश्यक है. उन्होंने कहा कि शिक्षा को शोधोन्मुखी बनाते हुए इसके प्रति विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को संवेदनशील बनाना बेहद जरूरी है. राज्यपाल ने कहा कि ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में प्राचीन भारत की जड़ें काफी गहरी जमी हुई हैं. उन्होंने सर्जरी के जनक सुश्रुत, महान गणितज्ञ आर्यभट्ट, विश्वविख्यात भारतीय अर्थशास्त्री कौटिल्य, जगदीश चन्द्र बोस आदि का उल्लेख करते हुए कहा कि इनके शोधों की महत्ता को पूरी दुनियाँ ने स्वीकारा है. राज्यपाल ने कहा कि हमारी वैदिक ऋचाएँ एवं पौराणिक साहित्य भी अणु-परमाणु, पर्यावरण-शिक्षा आदि कतिपय वैज्ञानिक तथ्यों से ओत-प्रोत रहे हैं.

राज्यपाल ने कहा कि पर्यावरण-संतुलन की तरह वैचारिक संतुलन और शुद्धि भी जरूरी है. मैकाले, मार्क्स, लेनिन के दर्शन और सिद्धांतों से परिचित होने के पूर्व हमें भारतीय चिन्तकों और मनीषियों के जीवन-चिन्तन और आदर्शों से भी अवगत होना जरूरी है तभी हमारी ज्ञान-संपदा और विचार-यात्रा संतुलित होगी. उन्होंने कहा कि पाश्चात्य इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के साथ न्याय नहीं किया है. राज्यपाल ने कहा कि भारतीय जीवन-दर्शन त्याग और तपस्या पर बल देता है. यह आत्मा की अमरता का विश्वासी है.‘इदन्नमम’ को माननेवाले भारतीय बड़े-से-बड़े त्याग के लिए सदैव तत्पर रहते हैं.‘यत पिंडे, तत् ब्रह्माण्डे’ हमारा केवल जीवन-दर्शन नहीं बल्कि आचार-सूत्र भी है.

राज्यपाल ने कहा कि भारतीय इतिहास और संस्कृति में शिक्षा और शांति को समान महत्व दिया गया है. प्राचीन काल में शिक्षा देनेवाले ‘ऋषि’ बराबर समाज को कुछ देने को इच्छुक रहते थे, समाज से कभी कुछ लेना उन्होंने नहीं चाहा. शिक्षकों को भी बराबर समाज के प्रति जवाबदेह रहना होगा, तभी नये राष्ट्र का भाग्योदय उत्कृष्ट रूप में हो सकेगा. राज्यपाल ने कहा कि उन्होंने अपने सुदीर्घ सार्वजनिक जीवन में निराशा को कभी स्वीकार नहीं किया है. यही कारण है कि वे उच्च शिक्षा के सुधार को लेकर सदैव तत्पर रहते हैं और इसपर काफी समय देते हैं.

राज्यपाल ने कहा कि बिहार में उच्च शिक्षा के सुधार-प्रयासों के अच्छे परिणाम दिखने लगे हैं. शिक्षा और परीक्षा-कैलेण्डरों का पालन होने लगा है। एक को छोड़कर सारे विश्वविद्यालयों में ‘दीक्षांत समारोह’ आयोजित करते हुए वर्षों से लंबित डिग्रियाँ विद्यार्थियों को उपलब्ध करा दी गई हैं. राज्यपाल ने कहा कि राज्य में उच्च शिक्षा के विकास हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. जो व्यवस्था में सुधार-प्रयासों के साथ जुड़कर सहयोग करेंगे, वे सम्मानित होंगे तथा जो इसे बाधित करेंगे, उन्हें अपने विरूद्ध कार्रवाई के लिए तैयार रहना होगा.

राज्यपाल ने कहा कि हमें ‘सँपेरों और जादू-टोनों का देश’ कहने वालों का पक्षपातपूर्ण नजरिया भी अब बदल रहा है. नये भारत का उत्थान हो रहा है. भारतीय नेतृत्व ने उम्मीदों की किरणें युवाओं को दिखा दी है, उसी रोशनी में देश अब सतत आगे बढ़ता जाएगा. राज्यपाल ने विद्वानों, शिक्षाविदों और विशेषज्ञों को आमंत्रित करते हुए एक सफल कार्यशाला आयोजित करने के लिए तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति एवं समस्त विश्वविद्यालय-परिवार को बधाई दी तथा उम्मीद जाहिर की कि सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति और विद्वान शिक्षक इस संवेदीकरण कार्यशाला से निश्चय ही लाभ उठायेंगे और अपने विश्वविद्यालयों में शोध-गतिविधियों में गुणवत्ता-विकास के प्रयास करेंगे.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपने ‘बीज-वक्तव्य’ के अंतर्गत इंडियन कॉन्सिल ऑफ सोशल रिसर्च(ICSSR) के अध्यक्ष डॉ० बी०बी० कुमार ने कहा कि आई०सी०एस०एस०आर० की विभिन्न शोध-परियोजनाओं से बिहारी विद्यार्थी एवं शिक्षक काफी कम रूप से लाभान्वित हो पा रहे हैं. विगत वर्षों के आँकड़े प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा के साथ हमने सिर्फ सूचना-तंत्र को जोड़ा है, फलतः हमारे शोध-कार्यों में मौलिकता और गुणवत्ता नहीं आ पा रही है. अपने संवेदनापूर्ण संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि यह एक विडम्बना है कि अत्यन्त कोमल और भावुक बच्चों को हम अपने शिक्षण संस्थानों से ज्यादातर एक क्रूर और उग्र युवा बनाकर निकालते हैं. डॉ० कुमार ने कहा कि अब समय आ गया है कि शिक्षा पर हम गंभीरता से सोंचे. उन्होंने कहा कि समाजशास्त्रियों को ही ‘थिंक-टैंक’ के रूप में शिक्षा-विकास के प्रयासों में अपनी अग्रणी भूमिका निभानी होगी. उन्होंने कहा कि ‘डॉक्टेरल फेलोशिप’, ‘सिंगल फेलोशिप’, ‘विभिन्न रिसर्च प्रोग्राम्स’ तथा ‘ट्रेनिंग एवं कैपिसिटी बिल्डिंग’ की विभिन्न परियोजनाओं के तहत बिहारी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को लाभ उठाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को अंग्रेज इतिहाकारों ने हमारी कुछेक विसंगतियों के कारण कलंकित करने का षड्यंत्रमूलक प्रयास जान-बूझकर किया है.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यपाल के उच्च शिक्षा परामर्शी प्रो० आर०सी० सोबती ने कहा कि वैश्विक मानकों के अनुरूप हमें अपने शोध-कार्यों को विकसित करना होगा. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के न्यू इंडिया विजन-2022 के अनुरूप अपनी उच्च शिक्षा को अप-टू-मार्क बनाना होगा.

कार्यक्रम में विषय-प्रवेश व स्वागत-भाषण करते हुए राज्यपाल के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह ने कहा कि कल्याणकारी राज्य में हमें सभी विश्वविद्यालयों को शिक्षा विकास के समान अवसर उपलब्ध कराने होंगे। उन्होंने कहा कि शोध के बगैर शिक्षा का कोई महत्व नहीं है.

आज की संवेदीकरण कार्यशाला के उद्घाटन-सत्र में यू०जी०सी० के उपाध्यक्ष डॉ० भूषण पटवर्द्धन, कॉन्सिल ऑफ साइंसटिफिक एण्ड इंडस्ट्रीयल रिसर्च के (HIRDIS) के हेड डॉ० ए०के० चक्रवर्ती आदि भी उपस्थित थे. कार्यशाला में तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० लीला चन्द साहा ने धन्यवाद-ज्ञापन किया.