राग शिवरंजनी…

राग शिवरंजनी…

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"बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है", "ओ मेरे सनम दो जिस्म मगर एक जान हैं हम", "रिमझिम के गीत सावन गाए", "तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अंजाना", "तुम्हे देखती हूँ तो लगता है ऐसे", "तुम से मिल कर ना जाने क्यों और भी कुछ याद आता है"

हमने जिस राग को चुना है, वो है शिवरंजनी. यह बहुत ही सुरीला राग होता है और इसे संध्या और रात्री के बीच में  गाया जाता है. यह राग भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गाया जाता है. जहाँ एक तरफ़ यह राग रुमानीयत की अभिव्यक्ति कर सकता है, वहीं दूसरी तरफ़ दर्द में डूबे हुए किसी दिल की  सदा बन कर भी बाहर आ सकती है. मूल रूप से शिवरंजनी का जन्म दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में हुआ था,  जो बाद में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी घुल-मिल गया. आपलोगों में से कई लोगों के मन में यह सवाल होगा कि, जब एक  ही राग पर कई गीत बनते हैं तो, फिर वो सब गानें अलग अलग क्यों सुनाई देते हैं ?  वो एक जैसे क्यों नहीं लगते ?, इसका कारण यह है कि किसी एक राग पर कोई गीत तीन सप्तक (ऒक्टेव्ज़) के किसी भी एक सप्तक पर कंपोज किया जा सकता है, और यही कारण है कि जिन्हे संगीत की तकनीक़ी जानकारी नहीं  है, वो सिर्फ़ गीत को सुन कर, आसानी से ये नहीं बता पाते हैं कि गीत किस राग पर आधारित है. कुछ गीतों में राग को आसानी से पहचाना जा सकता है, वहीं कुछ गीतों में रागों को पहचानने के लिए अच्छे-अच्छे जानकारों को भी पसीना बहाना पड़ता है. दूसरी तरफ़ कभी-कभी दो गानें जो एक ही राग पर आधारित होते हैं,  वो भी एक जैसे ही  सुनाई देते हैं, इसके पीछे का कारण है कि, जब कोई संगीतकार किसी राग पर आधारित  गीत बनाता है तो, वो उस राग की बंदिश को भी इस्तेमाल करने की कोशिश करता है. बंदिश ही वह “कामन  फ़ैक्टर” होता है, जो किसी राग के सभी धुनों में एक जैसा रहता है, इसी वजह से कभी कभी एक राग पर आधारित दो गीत एक जैसे ही सुनाई देते हैं.

आरोह-अवरोह सा रे ग१ प ध सा’ - सा′ ध प ग१ रे सा; रे, ध सा
आरोह-अवरोह सा रे ग१ प ध सा’ – सा′ ध प ग१ रे सा; रे, ध सा

जैसा कि, हमने पहले आपको बताया, “राग शिवरंजनी” रोमांस और दर्द,  दोनों के लिए प्रयोग में लाए जा सकते हैं. रोमांस की अगर बात करें, तो इस राग पर आधारित कुछ हिट गानें हैं, “बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है”, “ओ मेरे सनम दो जिस्म मगर एक जान हैं हम”, “रिमझिम के गीत सावन गाए”, “तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अंजाना”, “तुम्हे देखती हूँ तो लगता है ऐसे”, “तुम से मिल कर ना जाने क्यों और भी कुछ याद आता है”, इत्यादि. है ना इन सभी गीतों की धुनों में एक समानता, और अब एक नज़र उन गीतों पर भी जो हैं दर्द में डूबे हुए, “बनाके क्यों बिगाड़ा रे नसीबा”, “दिल के झरोखे मे तुझको बिठाकर”, “जाने कहाँ गए वो दिन”, “कहीं दीप जले कहीं दिल”,  “कई सदियों से कई जनमों से”,  “मेरे नैना सावन भादों फिर भी मेरा मन प्यासा”,  “ना किसी की आँख का नूर हूँ”, इत्यादि. संगीतकार शंकर जयकिशन ने “राग शिवरंजनी”  का विस्तृत सदुपयोग किया है. जितना उन्हे यह राग पसंद था,  उतना ही राज कपूर को भी. आज हमने इस राग पर आधारित जिस दर्द भरे गीत को चुना है, वह भी शंकर जयकिशन के ही धुन है, और फ़िल्म का नाम ‘प्रोफ़ेसर’. मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के गाए इस सदाबहार युगलगीत को लिखा है हसरत जयपुरी ने. “आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ, मोहब्बत में ना हमको इतना सताओ”. शम्मी कपूर और कल्पना  अभिनीत यह फ़िल्म आयी थी, सन् १९६२ में, जिसका निर्देशन किया था लेख टंडन ने. संगीत संयोजन में तबले का असरदार प्रयोग सुनाई देता है.

विशेष :- बहुत ही मधुर राग होता है, राग भूपाली में गंधार शुद्ध न लेते हुए गंधार कोमल लगाया जाये तो, राग शिवरंजनी हो जाता है. यह स्वर संगतियाँ राग शिवरंजनी का रूप दर्शाती हैं.

सा रे ग१ प ; ध प ग१ रे ; ग१ सा रे ,ध सा ; रे ग१ प ध प ध सा‘ ; ध साध प ग१ रे ; प ध प ग१ रे ; ग१ रे ग१ सा रे ,ध सा ;

  • स्वर मध्यम व निषाद वर्ज्य, गंधार कोमल.
  • शेष शुद्ध स्वर.
  • जाति औढव – औढव.
  • थाट काफी.
  • वादी/संवादी पंचम/षड्ज.
  • समय मध्य रात्रि विश्रांति स्थान प; सा‘; – सा‘; ; । मुख्य अंग रे ग१ प; ध प ग१ रे; ग१ सा रे ध सा;
  • आरोह-अवरोह सा रे ग१ प ध सा’ – साध प ग१ रे सा; रे, ध सा;

विशेष :- यह बहुत ही मधुर राग है. राग भूपाली में गंधार शुद्ध न लेते हुए गंधार कोमल लगाया जाये तो राग शिवरंजनी हो जाता है. यह स्वर संगतियाँ राग शिवरंजनी का रूप दर्शाती हैं – सा रे ग१…

  विमल कुमार…