राग यमन या कल्याण…

राग यमन या कल्याण…

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राग यमन भी एक ऐसा ही राग है जिसमें सभी सात सुर लगते हैं.

राग यमन को “राग कल्याण“ के नाम से भी जाना जाता है.इस राग कि उत्पत्ति कल्याण थाट से होती है, अत: इसे आश्रय राग भी कहा जाता है या यूं कहें किसी राग कि उत्पत्ति उसी नाम के थाट से हो रही है तो उसे कल्याण राग कहा जाता है. इस राग की विशेषता होती है कि इसमें तीव्र मध्यम और अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं तथा “ग” को वादी और “नि” को   सम्वादी माना जाता है. इसके आरोह और अवरोह दोनों में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं, इसलिये इसकी जाति सम्पूर्ण है. राग यमन को रात्रि के प्रथम प्रहर या संध्या के समय गाया-बजाया जाता है. राग यमन के बारे में बोला जाता है कि

                    प्रथम पहर निशि गाइये गनि को कर संवाद ।
                    जाति संपूर्ण तीवर मध्यम यमन आश्रय राग ॥

आरोह– सा रे ग, म॑ प, ध नि सां अथवा ऩि रे ग, म॑ प, ध नि सां .

अवरोह– सां नि ध प, म॑ ग रे सा .

पकड़– ऩि रे ग रे, प रे, ऩि रे सा .Raag Yaman01इस राग के दो नाम है यमन और कल्याण. यमन और कल्याण भले ही एक राग हों, मगर यमन और कल्याण दोनों के नाम को मिला देने से एक और राग की उत्पत्ति होती है, जिसे राग यमन-कल्याण कहा जाता  हैं, जिसमें दोनों मध्यम प्रयोग किये जाते हैं.  यमन कल्याण में शुद्ध “म” केवल अवरोह में दो गंधारों के बीच प्रयोग किया जाता है… जैसे- प म॑ ग म ग रे, नि रे सा .  अन्य स्थानों पर आरोह-अवरोह दोनों में तीव्र म प्रयोग किया जाता है… जैसे- ऩि रे ग म॑ प, प म॑ ग म ग रे, नि रे सा.

आरोह अवरोह को आसान शब्दों समझते हैं. ये तो हम जानते ही हैं कि सात सुर होते हैं. सा, रे, ग, म, प, ध, नी. शास्त्रीय संगीत के सभी राग इन्हीं सुरों के ‘कॉम्बिनेशन’ से बनते हैं. किसी एक राग में कोई एक सुर नहीं लगता तो किसी राग में कोई दूसरा सुर. कई रागे ऐसी भी हैं जिनमें सभी सात सुर लगते हैं. राग यमन भी एक ऐसा ही राग है जिसमें सभी सात सुर लगते हैं. आरोह और अवरोह को एक सीढ़ी की तरह मान सकते हैं. आरोह का मतलब है कि सुरो कि सीढ़ी का ऊपर जाना और अवरोह का मतलब है कि उसी सीढ़ी से वापस उतरना. वादी, संवादी और पकड़ का मतलब ये होता है कि आप जैसे ही इन नियम कायदों में बंध कर गाएंगे शास्त्रीय संगीत के जानकार तुरंत इस बात को पकड़ लेंगे कि आप कौन सा राग गा रहे हैं.

बताते चलें कि मधुबाला को राग यमन से बहुत प्यार था, इतना प्यार कि वो खुद को ‘मिस यमन’ कहलाना पसंद करती थीं.1960  में आई फिल्म ‘बरसात की एक रात’ सुपरहिट हुई थी, उसके म्यूजिक डायरेक्टर रोशन को भी इस फिल्म के संगीत के लिए खूब सराहा गया था. इस फिल्म के हित होने के बड़ा कारण गाने को राग यमन पर कम्पोज किया गया था. राग यमन की यही खूबसूरती है कि हिंदी फिल्मों को कई सुपरहिट गाने मिले हैं. राग यमन की खूबी यह  है कि इसकी सभी कॉम्पजिशन ‘लाइट म्यूजिक’ में ये बेहद लोकप्रिय होते हैं. फिल्मी गानों से निकलकर जब बात गजलों में आती है, तब राग यमन पर आधारित ये गजलों में सबसे पहले याद आती है, गजल सम्राट उस्ताद मेहदी हसन की. उर्दू के मशहूर शायर अहमद फराज ने लिखा था कि एक और गजल देखिए, जो आपको राग यमन की ‘पॉप्युलैरिटी’ को समझाएगी. फरीदा खानम की आवाज में गाई गई गजल आज भी तमाम महफिलों की शान होती हैं, जिनका जिक्र हर किसी की जुबान पर होता है  “आज जाने की जिद ना करो”.  लोकप्रियता का आलम ये है कि करन जौहर ने अपनी फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में इस गजल को अरिजित सिंह और शिल्पा राव ने भी गाया था. गजल ही क्या कव्वाली के तौर पर भी राग यमन की ये कॉम्पजिशन सुपरहिट है. फिल्म ‘दिल ही तो है’ में नूतन पर फिल्माई गई ये कव्वाली आज भी सुपरहिट है.

कहा जाता है कि मुस्लिम संगीत जानकारों के अनुसार इस राग यमन को इमन कहना शुरू किया, लेकिन इसका प्राचीन नाम कल्याण है. आज इस राग को दोनों नामों से जाना जाता है, यमन और कल्याण. कल्याण के कई प्रकार मिलते हैं- शुद्ध कल्याण, पूरिया कल्याण, जैत कल्याण वगैरह. इसमें बड़ा खयाल, छोटा खयाल, तराना, ध्रुपद वगैरह गाए जाते हैं. एक तो शाम का राग है और दूसरे बहुत ही मधुर है, इसलिए संगीत समारोहों में ये राग खूब सुनने को मिलता है.