राग खमाज…

राग खमाज…

2409
0
SHARE
यह राग शृंगारप्रधान है. अत: इसके गाने का समय रात्रि का दूसरा पहर बताया गया है. इसका व्याकरण देखें तो इस राग की उत्पत्ति खमाज थाट से ही मानी गई है, यानी ये अपने थाट का आश्रय राग है.

भारतीय संगीत पद्धति के दस थाटों में से एक खमाज राग भी है. इसका वादी स्वर गांधार और संवादी निषाद है, आरोह में ऋषभ वर्जित है. निषाद शुद्ध, अवरोह कोमल और अन्य सभी शुद्ध स्वर लगते हैं. यह राग शृंगारप्रधान है. अत: इसके गाने का समय रात्रि का दूसरा पहर बताया गया है. इसका व्याकरण देखें तो इस राग की उत्पत्ति खमाज थाट से ही मानी गई है, यानी ये अपने थाट का आश्रय राग है.

यह राग शृंगारप्रधान है. अत: इसके गाने का समय रात्रि का दूसरा पहर बताया गया है. इसका व्याकरण देखें तो इस राग की उत्पत्ति खमाज थाट से ही मानी गई है, यानी ये अपने थाट का आश्रय राग है.

राग खमाज में आरोह में “रे” नहीं लगता है, जबकि अवरोह में सातों स्वर लगते हैं, इसलिए इसकी जाति है षाडव-संपूर्ण. आरोह में निषाद शुद्ध लगता है जबकि अवरोह में कोमल निषाद लेकर आते हैं, बाकी सारे शुद्ध स्वर हैं. इस राग का वादी स्वर गंधार और संवादी निषाद माना गया है. आरोह या अवरोह सुरों की एक सीढ़ी जैसा होता है. सुरों के ऊपर जाने को आरोह और नीचे आने को अवरोह कहते हैं. किसी भी राग में वादी और संवादी सुर अहमियत के लिहाज से बादशाह और वजीर जैसे होते हैं.

आरोह- सा गम पध नि सां

अवरोह- सां नि ध पम गरे सा

पकड़- नि म प ध S म गप म ग रे सा

दरअसल, खमाज चंचल प्रकृति का राग है. इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और टप्पा गाते हैं, विलंबित ख्याल गाने का प्रचार नहीं है. खास तौर पर राधा और कृष्ण के प्रेम वाली ठुमरी इस राग में खूब गाई जाती है. ठुमरी गाते हुए आरोह में भी कभी कभी ऋषभ लगाते हैं. सुंदरता बढ़ाने के लिए दूसरे रागों की छाया भी दिखाते हैं, हालांकि ऐसा करने पर इस राग को फिर मिश्र खमाज कहा जाता है.शास्त्रीय कलाकारों ने भी इस राग का अधिक प्रयोग किया है. पंडित अजय चक्रवर्ती ने तो बाकयदा पटियाला घराने की बेगम परवीन सुल्ताना के साथ इस राग में फिल्म गदर में ठुमरी भी गाई है. जिसे संगीतकार उत्तम सिंह ने कंपोज किया था. ‘आन मिलो सजना, अंखियों में ना आए निंदिया’.

हिंदी सिनेमा के गानों में भी इस राग का प्रयोग किया गया है. जैसे:- ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘रैना बीती जाए’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘डोली में बिठाए के

यह राग शृंगारप्रधान है. अत: इसके गाने का समय रात्रि का दूसरा पहर बताया गया है. इसका व्याकरण देखें तो इस राग की उत्पत्ति खमाज थाट से ही मानी गई है, यानी ये अपने थाट का आश्रय राग है.

कहार’, ‘ये क्या हुआ और बड़ा नटखट है ये कृष्ण कन्हैया’, ‘चिंगारी कोई भड़के’ के राग भैरवी में था.  ‘कुछ तो लोग कहेंगे’  राग खमाज में था और ‘ये क्या हुआ’ में राग कलावती की छाप थी. गानों की धुन तैयार करने में संगीतकार, गीतकार के बीच की असली कहानी …

 “बड़ा नटखट है ये कृष्ण कन्हैया  गाने की धुन लगभग तैयार हो गई थी. आरडी बर्मन ने वो धुन अपने पिता और महान संगीतकार एसडी बर्मन को सुनाई, लेकिन एसडी बर्मन ने धुन को खारिज कर दिया. उन्होंने पंचम को समझाया कि उनकी तैयार की गई धुन गाने के ‘सिचुएशन’ पर सही नहीं बैठ रही है. लेकिन पंचमदा को बात समझ में नहीं आ रही थी, तब एसडी बर्मन ने उन्हें समझाया कि, इस गाने में शर्मिला टैगोर नटखट से बच्चे नंदू को जिस अंदाज में आवाज लगा लगाकर खोज रही हैं, उसके लिए संगीत अलग होना ही चाहिए. पंचम दा को कुछ बात समझ आई और उन्होंने गाने की तैयार की गई धुन पर दोबारा मेहनत की, उसके बाद ये गाना तैयार हो गया.  इस गाना को आरडी बर्मन ने राग खमाज में बनाया था, उन्हें भी ये राग पसंद था, क्योंकि, अपनी बाद की फिल्मों में भी उन्होंने इस राग का इस्तेमाल किया है. इसी फिल्म में राजेश खन्ना पर फिल्माया गया गाना “ कुछ तो लोग कहेंगे “  भी राग खमाज पर ही था.

इस फिल्म के साथ ही डायरेक्टर शक्ति सांमत की राजेश खन्ना के साथ हिट फिल्मों की हैट्रिक लगी थी, अमर प्रेम से पहले “आराधना” और कटी पतंग भी सुपरहिट हो चुकी थीं. अमर प्रेम से करीब एक साल पहले ही हिंदी फिल्म आई थी, बुड्ढा मिल गया. जाने माने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म की कहानी भी जबरदस्त थी. उस फिल्म में संगीतकार आरडी बर्मन ने राग खमाज का अद्भुत इस्तेमाल किया था. गाने के बोल थे… “ आयो कहां से घनश्याम, रैना बिताई किस धाम”.  दिलचस्प बात तो ये है कि ये शायद उन गिने चुके मौकों में से एक होगा, जब ओम प्रकाश साहब पर कोई गीत फिल्माया गया था. जिसमें वो बाकयदा हारमोनियम लेकर इस गाने को फिल्म की हीरोइन को सुना रहे हैं. यह गीत मन्ना डे ने गाया था.

बात चल रही है राग खमाज की तो आपको वो भजन के बारे में बताते है, जो शायद ही किसी भारतीय ने नहीं सुना हो. “ वैष्णव जन तो तेने कहिये ” गुजरात के संत कवि नरसी मेहता  का लिखा हुआ है ये भजन. यह भजन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को बहुत ही पंसद था. इस भजन की लोकप्रियता और प्रासंगिकता को ऐसे ही समझा जा सकता है कि, शायद ही देश का कोई नामी कलाकार हो, जिसने इस भजन को गाया या बजाया ना हो. भारत रत्न से सम्मानित एम० एस०  सुब्बालक्ष्मी से लेकर लता मंगेशकर तक और अनूप जलोटा से लेकर अनुराधा पौडवाल तक हर किसी ने इस भजन को गाया है, दूसरी तरफ बड़े से बड़े शास्त्रीय वादकों ने इस भजन को अपने साज पर जरूर छेड़ा है. यही है राग खमाज की खासियत.

विमल कुमार…