मेंडल के वंशागति या आनुवंशिकता के नियम…

मेंडल के वंशागति या आनुवंशिकता के नियम…

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फोटो :- गूगल.
  • प्रभाविता का नियम :- जब एक जोड़ी विपर्यासी समयुग्मजी पादपों में संकरण कराया जाता है , जो लक्षण F1, पीढ़ी के अभिव्यक्त होते हैं , उसे प्रभावी तथा जो लक्षण F1, पीढ़ी में अभिव्यक्त नहीं होते उसे अप्रभावी कहते हैं.
  • पृथक्करण का नियम :- F1, पीढ़ी के विषमयुग्मजी (संकर) से युग्मक बनते समय दोनों युग्मविकल्पी एक दूसरे से पृथक हो जाते हैं. तथा अलग – अलग युग्मकों में जाते हैं, इसे ही युग्मकों की शुद्धता का नियम या पृथक्करण का नियम कहते हैं.
  • स्वतंत्र अपव्यूह्न का नियम :- दो या दो से अधिक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों युक्त पादपों के बीच संकरण कराया जाता है, तो प्रत्येक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों की वंशागति एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होती है. इसे ही स्वतंत्र अपव्यूह्न का नियम कहते हैं.

वंशागति के नियमों का महत्व :-

  • अप्रभावी लक्षण विषमयुग्मजी अवस्था में प्रकट नहीं होते हैं.
  • संकरण विधि द्वारा उपयोगी लक्षणों का विकास किया जा सकता है.
  • सुजननिकी (Eugenics) मेंडलीय नियमों पर आधारित है.
  • जीन संकल्पना की पुष्टि पृथक्करण के नियम से होती है.
  • मेंडल के नियमों के उपयोग से रोग प्रतिरोधक तथा अधिक उत्पादन वाले फसली पौधों की किस्में विकसित की जाती हैं.
  • संकरण विधि से अनुपयोगी लक्षणों को हटाया जा सकता है तथा उपयोगी लक्षणों को एक साथ एक ही जाति में लाया जा सकता है.