मूलक या मुली….

मूलक या मुली….

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मूली शब्द संस्कृत के 'मूल' शब्द से बना है. फोटो:-दीनानातथ शर्मा.

भारतवर्ष में जड़ों वाली सब्जियों में मूली एक प्रमुख फ़सल है. यह फसल  आमतौर पर  जाड़े के मौसम से दिखना शुरू हो जाता है. इसका प्रयोग आमतौर पर सलाद , आचार ,पराठे व चिकत्सीय प्रयोग में किया जाता है. मुली में बहुत सारे रस, स्वाद में तीख़ी या मीठी होती है। इसे अंग्रेजी में Radish कहते है और इसका वानस्पतिक नाम रफ़ानस सैटिवास (Raphanus sativus) है. मूली शब्द संस्कृत के ‘मूल’ शब्द से बना है.आयुर्वेद में इसे मूलक नाम से, स्वास्थ्य का मूल अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया गया है. मुली को पुरे विश्व में उगाया जाता है और इसकी हजारों प्रजातियाँ मौजूद है, जो आकार, रंग एवं पैदा होने में लगने वाले समय के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है.

आयुर्वेद के अनुसार, मुली की तासीर  गर्म होती है जबकि मुली देखने पर उसकी तासीर ठंडी प्रतीत होती है. मूली एक रूपान्तिरत प्रधान जड़ है जो बीच में मोटी और दोनों सिरों की ओर क्रमशः पतली होती है.आयुर्वेद के अनुसार,  मूली में प्रोटिन, कर्बोहायड्रेट, फॉस्फरस ,सोडियम ,पोटैशियम ,कैल्सियम,विटामिन ए, डी, बी 12 और लोहा पाया जाता है. बताते चलें की, मूली में जितने गुण पाए जाते हैं उससे कहीं जयादा उसके पत्तों में पाए जातें हैं। मूली के पत्ते में खनिज लवण, कैल्शियम, फास्फोरस आदि अधिक मात्रा में पाया जाता हैं साथ ही इसमें आयरन, कैल्शियम, फोलिक एसिड, विटामिन सी और फॉस्फोरस और डायटरी फाइबर  पाया जाता है.

इतिहास:-

मूली के इतिहास एवं उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि इसकी उत्पत्तिकेन्द्रीय एवं पश्चिमी चीन और भारत है.यह मेडीरेरियन क्षेत्र में जंगली रूप में पायी जाती हैं. मूली के बारे में चीनी इतिहास में इसका उल्लेख मिलता है.अत्यंत प्राचीन चीन और यूनानी व्यंजनों में इसका प्रयोग होता था और इसे भूख बढ़ाने वाली समझा जाता था.यूरोप के अनेक देशों में भोजन से पहले इसको परोसने की परंपरा का उल्लेख मिलता है.

कृषि:-

 

मूली की खेती अब पूरे वर्षभर की जा सकती है. इसकी अच्छी पैदावार के लिए ठंडी जलवायु उत्तम होती है.दोमट या बलुई दोमट मिटटी अच्छी होती है. मूली को लगाने के 40-50 दिनों के बाद यह खाने लायक हो जाती है.

उपयुक्त :-

आमतौर पर हम सभी मूली को खाकर उसके पत्तों को फेंक देते हैं. मूली के पत्ते को कभी फेकना नहीं चाहिए, हमेशा मूली खाते वक्त इसे भी खाना चाहिये. मूली के पौधे में आने वाली फलियाँ ‘मोगर’ भी समान रूप से उपयोगी और स्वास्थ्यवर्धक है.आमतौर लोग मोटी मूली पसन्द करते हैं.कारण है  ईसका अधिक स्वादिष्ट होना है परन्तु,  स्वास्थ्य तथा उपचार की दृष्टि से छोटी, पतली और चरपरी मूली ही उपयोगी मानी जाती है.ऐसी मूली को  त्रिदोष वात, पित्त और कफ नाशक  मानी जाती है जबकि मोटी और पकी मूली त्रिदोष कारक मानी जाती है.

मूली के गुण :-

 

  • मूली हमारे दाँतों को मज़बूती प्रदान करती है साथ ही हडि्डयों को भी शक्ति प्रदान करती है.
  • मूली का ताजा रस पीने से मूत्र संबंधी रोगों में राहत मिलती है.
  • पीलिया रोग में भी मूली लाभ पहुँचाती है.
  • पानी में मूली का रस मिलाकर सिर धोने से जुएं नष्ट हो जाती हैं.
  • मूली को सौंदर्यवर्द्धक भी माना जाता है.
  • नीबू के रस में मूली का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे का सौंदर्य निखरता है.
  • मूली पत्ते चबाने से हिचकी बंद हो जाती है
  • एक कप मूली के रस में एक चम्मच अदरक का और एक चम्मच नीबू का रस मिलाकर नियमित सेवन से भूख बढ़ती है.
  • मोटे लोगों के लिए मूली के पत्तों का सेवन काफ़ी फ़ायदेमंद है, क्योंकि इनमें पानी की मात्रा अधिक रहती है.
  • भोजन के बाद मूली खाने से बालों का असमय गिरना बंद हो जाता है.साथ ही ख़ून को साफ़ करता है और इससे शरीर की त्वचा भी मुलायम होती है.
  • हडि्डयों के लिए मूली के पत्तों का रस पीना फ़ायदेमंद है।
  • मूली के नरम पत्तों पर सेंधा नमक लगाकर सुबह खाने से मुंह की दुर्गंध दूर होती है.
  • हाथ-पैरों के नाख़ूनों का रंग सफ़ेद हो जाए तो मूली के पत्तों का रस पीना लाभकारी माना जाता है.
  • पेट में गैस बनती हो तो मूली के पत्तों के रस में नीबू का रस मिलाकर पीने से तुरंत लाभ होता है.
  • मूली स्वयं हजम नहीं होती, लेकिन अन्य भोज्य पदार्थों को पचा देती है.
  • भोजन के बाद यदि गुड़ की 10 ग्राम मात्रा का सेवन किया जाए तो मूली भी पच जाती है.
  • मूली का रस रुचिकर एवं हृदय को आनंदित करने वाला होता है.
  • गुड़, तेल या घृत में भुनी मूली के फूल कफ वायुनाशक हैं तथा फल पित्तनाशक माना जाता है.
  • मूली के पतले कतरे सिरके में डालकर धूप में रखें, रंग बादामी हो जाने के बाद खाने से भूख लगती है.
  • मूली के रस में नमक मिलाकर पीने से पेट का भारीपन, अफरा, मूत्ररोग दूर होता है.

आयुर्वेद के अनुसार, मूली शरीर से कार्बन डाई ऑक्साइड निकालकर ऑक्सीजन प्रदान करती है. साथ  ही थकान मिटाने और अच्छी नींद लाने में मूली का विशेष योदान होता है.मूली हाई ब्लड प्रेशर को कण्ट्रोल करने में सहायक होती है. यदि पेट में की़डें हो गये हों, तो उनको निकालने में भी कच्ची मूली लाभदायक होती है. कहा जाता है कि,पेट संबंधी रोगों में मूली के रस में अदरक का रस और नीबू मिलाकर नियम से पीया जाये, तो भूख बढ़ती है. त्वचा के रोगों में यदि मूली के पत्तों और बीजों को एक साथ पीसकर लेप कर दिया जाये, तो यह रोग खत्म हो जाते हैं.

ध्यान दें:-

  • मूली के साथ मछली कभी भी नहीं खाना चाहिए.
  • मूली खाने के तुरंत बाद दूध नहीं पीना चाहिये.
  • चना या यूँ कहें कि, काले चने के साथ भी मूली नहीं खाना चाहिए.
  • अधिक मात्रा में मूली खाने से गले में दर्द , भूख की कमी , मुंह और गले में सूजन हो सकता है.