माघी पूर्णिमा…

माघी पूर्णिमा…

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राम के वनवास जाने के बाद भरत जब अयोध्या आए और माता कौशल्या से मिलने गए और कहा...

भारतीय संस्कृति में दिन, माह, पूर्णिमा और अमावस्या का विशेष महत्व होता है. हिंदी कैलेंडर या पंचांग के अनुसार महीनों के नाम नक्षत्रानुसार रखें गये हैं. हर नक्षत्र की अपनी अलग उपयोगिता होती है. जबकि पूर्णिमा पंचांग के अनुसार मास की 15वीं और शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि (तारीख) है, जिस दिन चंद्रमा आकाश में पूरा होता है. वैसे तो हर महीने की पूर्णिमा को कोई न कोई व्रत या पर्व अवश्य होता है.

वर्तमान समय में माघ का महीना (मघा नक्षत्र के कारण इसे माघ का महीना कहते हैं) अपने अंतिम पड़ाव पर है और पूर्णिमा भी आने वाली है जो अत्यंत ही शुभ है. इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है.इस पूर्णिमा के बारे में पौराणिक ग्रन्थों में विस्तार से बताया गया है. पौराणिक ग्रन्थों में माघ के महीने में नदी स्नान पर विशेष जोर दिया गया है. इस महीने में नदी या संगम स्नान करने कई फायदे हैं जिसे वैज्ञानिकों ने भी माना है. इस महीने में नदी स्नान करने का बड़ा फायदा यह होता है कि, ऋतु के परिवर्तन होने से स्वस्थ की समस्या नहीं होती है साथ ही हमारे पाप भी नष्ट हो जाते हैं.

पौराणिक ग्रंथो के अनुसार, इस महीने में भगवान विष्णु गंगा जल में निवास करते हैं और गंगा जल के स्पर्श मात्र से ही सारे पापों का अंत हो जात है और मानव को स्वर्ग की प्राप्ती होती है. पद्दम पुरानों के अनुसार, भगवान नारायण की पूजा-पाठ, उपवास और दान से भी उतने प्रसन्न नहीं होते है जितना की माघ महीने में नदी स्नान करने से होते हैं. महाभारत में भी माघ स्नान व तीर्थ दर्शन का उल्लेख किया गया है. शास्त्रों में एक प्रसंग है कि, राम के वनवास जाने के बाद भरत जब अयोध्या आए और माता कौशल्या से मिलने के गये. वहां, भरत ने माता कौशल्या से कहा कि, ‘यदि राम को वन भेजे जाने में उनकी किंचितमात्र भी सम्मति रही हो तो वैशाख, कार्तिक और माघ पूर्णिमा के स्नान सुख से  वो वंचित रहें, और उन्हें निम्न गति प्राप्त हो’. यह सुनते ही माता कौशल्या ने भारत को गले से लगा लिया.

माघी पूर्णिमा कल्पवास की पूर्णता का महापर्व है. एक महीने तक नदी या संगम के तट पर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए और स्नान, दान, तप और भक्ति की पूर्णाहुति का महापर्व है माघी पूर्णिमा. माघी पूर्णिमा के बाद कल्पवासी अपने–अपने घरों की और वापस लौट जाते हैं. कहा जाता है कि, माघ पूर्णिमा में प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी या घर पर ही स्नान करके भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए साथ ही काले तिलों से हवन और पितरों का तर्पण करना चाहिए. इस माहीने में तिल के दान का विशेष महत्व होता है. मत्स्य पुराण के अनुसार, माघ मास की पूर्णिमा को कोई व्यक्ति ब्रह्माण को दान करता है उसे ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है. माघी पूर्णिमा के दिन प्रात: काल सूर्य उदय होने से पहले घर या नदी स्नान कर भगवान सत्यनारायणजी की पूजा व कथा की जाती है. इस पूजा में पंचामृत और चूरमा का विशेष महत्व होता है.

ज्योतिष के अनुसार, माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को यदि शनि मेष राशि पर, गुरु और चन्द्रमा सिंह राशि में और सूर्य श्रवन नक्षत्र पर हो तो इस योग को महामाघी पूर्णिमा कहते है. इस दिन के किए गए स्नान-दान का फल अक्षय होता है.

कथा :-

प्राचीन समय में कांतिका नामक एक नगर था जहाँ धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था. वह नि:संतान था और लाख जतन (उपाय) करने के बाद भी उसकी पत्नी रूपमती से कोई संतान नहीं हुई. ब्राह्मण दान आदि मांग कर अपना जीवन निर्वाह करता था. एक दिन की बात है, एक व्यक्ति ने ब्राह्मण दंपत्ति को दान देने से इसलिए मना कर दिया कि वह नि:संतान दंपत्ति को दान नहीं करता है. । लेकिन उसने उस ब्रहामण को सलाह दी कि वो चंद्रिका देवी की आराधना करें.

इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति ने माँ काली की घनघोर आराधना की. 16 दिनों के उपवास के बाद माँ काली प्रकट हुईं और बोलीं ‘तुमको संतान की प्राप्ति अवश्य होगी. अपनी शक्ति के अनुसार आटे से बना दीप जलाओं और उसमें एक-एक दीप की वृद्धि करते रहना यह कर्क पूर्णिमा के दिन तक 22 दीपों को जलाने की हो जानी चाहिए’. देवी के कथनानुसार ब्राह्मण ने आम के वृक्ष से एक आम तोड़ कर पूजन हेतु अपनी पत्नी को दे दिया. पत्नी इसके बाद गर्भवती हो गयी। देवी के आशीर्वाद से देवदास नाम का पुत्र पैदा हुआ.

देवदास पढ़ने के लिए अपने मामा के साथ काशी गया, लेकिन रास्ते में घटना हुई और प्रपंचवश उसे विवाह करना पड़ा. जबकि देवदास ने साफ-साफ बता दिया था कि वह अल्पायु है, लेकिन विधि के चक्र के चलते उसे मजबूरन विवाह करना पड़ा. उधर, काशी में एक रात प्राण हरने काल आया लेकिन, लेकिन व्रत के प्रताप से देवदास जीवित हो गया.