महाशिवरात्रि…

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महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं. फोटो:-गूगल..

हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का अंतिम महीना ‘फाल्गुन’ का महीना चल रहा है. फाल्गुनी नक्षत्र होने के कारण ही इस महीने का नाम फाल्गुन पड़ा. इस महीने से धीरे धीरे गरमी की शुरुआत होती है और सर्दी कम होने लगती है. बसंत का प्रभाव होने से इस महीने में प्रेम और रिश्तों में मधुर संबंध होते हैं. वैसे तो इस महीने में कई पर्व और त्यौहार मनाए जाते हैं लेकिन, उनमे से प्रमुख पर्व में फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को भगवान् शिव की उपासना का महापर्व शिवरात्री और पूर्णिमा को रंगों का पर्व होली मनाया जाता है.

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, एक ऐसे भगवान जिनके कई नाम हैं और हर नाम की अलग-अलग विशेषता है जैसे रूद्र. रूद्र का अर्थ होता है रोनेवाला, उसी  प्रकार उनका एक नाम है शिव. वैसे तो देखा जाय तो शिव की विवेचना ज्ञानी लोग अपने-अपने तरीके से करते हैं. आखिर शिव का अर्थ है क्या? तार्किक दृष्टिकोण हो या वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोण से भी देखते है तो भी शिव का अर्थ और उसके मायने भी एक ही होते हैं. शिव का अर्थ होता है “ शिव” शब्द का अर्थ “शुभ, स्वाभिमानिक, अनुग्रहशील, सौम्य, दयालु, उदार, मैत्रीपूर्ण” होता है”. लोक व्युत्पत्ति में “शिव” की जड़ “शि” है जिसका अर्थ है जिन में सभी चीजें व्यापक है और “वा” इसका अर्थ है “अनुग्रह के अवतार”.

ऋग वेद में शिव शब्द एक विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाता है, रुद्रा सहित कई ऋग्वेदिक देवताओं के लिए एक विशेषण के रूप में है. शिव शब्द ने “मुक्ति, अंतिम मुक्ति” और “शुभ व्यक्ति” का भी अर्थ दिया गया है. शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं. शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं. शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है. शिव के कुछ प्रचलित नाम, महाकाल, आदिदेव, किरात, चन्द्रशेखर, जटाधारी, नागनाथ, मृत्युंजय, त्रयम्बक, महेश, विश्वेश, महारुद्र, विषधर, नीलकण्ठ, महाशिव, उमापति, काल भैरव, भूतनाथ आदि.

वेद के अनुसार इनका नाम रूद्र भी है, वहीं ऋग्वेद में जहां सूर्य, वरुण, वायु, अग्नि, इंद्र आदि प्राक्रतिक शक्तियों की उपासना की जाती है वहीं ‘रूद्र’ का भी उल्लेख किया गया है. सागर मंथन से पहले भगवान शिव को रूद्र के नाम से जाना जाता था. रूद्र जिन्हें विनाशकारी शक्तियों के प्रतीक के रूप में गौण देवता माने जाते थे, लेकिन सागर मंथन के बाद रूद्र नये रूप में शिव बने. शिव का विचित्र अमंगल स्वरूप दुसरे देवताओं से अलग है. शिव जो कि, नंग-धडंग, शरीर पर राख लपेटे या मले हुए, जटाजूटधारी, सर्प लपेटे, गले में हडडीयों एवं नरमुंडों  की माला पहने, हाथों में त्रिशूल व डमरू, माथे पर एक और आँख, सिर पर चन्द्रमा को धारण किये हुए और उनका वाहन नंदी तथा गण भूत, प्रेत या पिशाच.

ऐसे अबधूत रूप के धनी जिन्हें औघरदानी भी कहा जाता है और जो सबके लिए सुगम्य चाहे वो, देव हों या दानव. ऐसे अदभुत स्वरूप के स्वामी जो कई प्रकार के चिन्हों का प्रयोग करते है और हर चिन्ह के अपने-अपने महत्व हैं. भगवान शिव को त्रयंबक भी कहा जाता है, आमतौर पर देव हों या दानव उनकी दो ही आँख होती है लेकिन, भगवान शिव की तीसरी आँख भी है. जिस प्रकार दो आँखों से भौतिक पदार्थों को ही देख सकते है उसी प्रकार तीसरी आँख का मतलब होता  है ‘बोध’. ‘बोध’ का अर्थ होता है ऊर्जा को विकसित करना या यूँ कहें कि, अपने स्तर को ऊँचा करना. शिव के कई नाम हैं उन्हें सोम या सोमसुंदर भी कहा जाता है. सोम का एक और अर्थ होता है चंद्रमा वैसे तो सोम का अर्थ होता है नशा. पुरानों में चंद्रमा को नशे का श्रोत भी कहा गया है.

पुरानों में शिव को योगी व अनंत भी कहा गया है और उनके हाथों में हमेशा एक त्रिशूल होता है. त्रिशूल जो जीवन के तीन मूल आयाम है यह उसी को दर्शाता है. त्रिशूल में तीन कोण होते हैं उन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना भी कहते हैं. ये तीनों प्राणमय कोष मानव तंत्र के तीन मुलभुत नाड़ियाँ हैं जिसे हम सभी बाईं, दाहिनी और मध्य के नाम से जानते हैं. मानव शरीर में इन तीन नाड़ियों से प्राणवायु का संचार होता है. भगवान शिव के गले में सर्प की माला होती है. योग में कुंडलिनी का वर्णन होता है, और सर्प को कुंडलिनी का प्रतीक भी माना जाता है. कुंडलिनी का अर्थ होता है ऊर्जा. अगर ऊर्जा स्थिर हो तो उसका पता नहीं चलता है और उसे जाग्रत कर दिया जाय तो उसके स्वरूप का अहसास होता है.

भगवान शिव के मूल मंत्र में पांच मन्त्रों का समायोजन है, जिसे पंचाक्षर भी कहा जाता है. प्रकृति में मौजूद पांच तत्वों के प्रतीक को ही पंचाक्षर माना जाता है. जिस प्रकार मानव शरीर में पांच द्वार कहे गये है और पाँचों द्वार की शुद्धि की जाती है, और इन पांच केन्द्रों को जगाकर योग क्रिया की जाती है. पुरानों के अनुसार भगवान शिव एक लोटे जल और एक वेलपत्र से खुश या प्रसन्न हो जाते हैं. आखिर विल्वपत्र या वेल पत्र शिव को इतना प्रिय क्यों है? पौराणिक ग्रंथो के अनुसार, बेल के वृक्ष को सम्पूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल भी कहा जाता है. चूकिं बेलपत्र को भगवान शिव के त्रिनेत्र रूप का प्रतीक भी माना जाता है या यूँ कहें कि, इसकी तीन पत्तियों को सत्व, रज और तम के रूप में भी जाना जाता है.

शिव महापुराण के अनुसार, भगवान शिव मात्र एक लोटा जल, बेलपत्र, मंत्र जप से ही प्रसन्न हो जाते है. अत: मनुष्य अगर शिव का इतना भी पूजन कर लें तो पाप कर्मों से सहज मुक्ति प्राप्त हो जाती है. शिव की आराधना, साधना, उपासना से मनुष्य अपने पापों एवं संतापों से इसी जन्म में मुक्ति पा सकता है.

फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला महापर्व है महाशिवरात्रि. इस दिन त्रिदेवों के एक देव महादेव की उपासना की जाती है. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को भगवान शंकर का ब्याह या यूँ कहें कि, विवाह माता पार्वती से हुआ था. माता पार्वती भी भगवान गंगाधर को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. उसके बाद माता का विवाह भगवान विशेश्वर से हुआ था. भगवान मृत्युंजय ने माता पार्वती से विवाह के दौरान सात वचन दिए थे, तभी से ये परम्परा वर्तमान समय तक चला आ रहा है.

वैसे तो प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी ‘शिवरात्रि’ कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्णपक्ष की  त्रयोदशी को ‘महाशिवरात्रि’ कहा जाता है. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, इस दिन शिवोपासना करने से भक्ति और मुक्ति दोनों ही देने वाली मानी जाती है. कहा जाता है कि, इस दिन की अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली त्रयोदशी ग्रहण करनी चाहिए. नारद संहिता  के अनुसार, फाल्गुन कृष्णपक्ष की त्रयोदशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है. जबकि, ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ था.

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं यद्यपि त्रयोदशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं.