महाकाल की अनूठी शाम…

महाकाल की अनूठी शाम…

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नगरवधूयें महाश्मशान में आकर नृत्य और संगीत से बाबा मसान को प्रसन्न करती है. छायाचित्र :- जेपी

मानव जीवन जितना सत्य है उतना ही सत्य है मृत्यु. मृत्यु उपरान्त लोग अपनी-अपनी आस्था या यूँ कहें कि परम्परा, रीति-रिवाज के अनुसार दैहिक जीवन के आखरी रस्मो-रिवाज की प्रक्रिया को अंजाम देते है. हिन्दू धर्म में सोलह संस्कार किए जाते हैं. उन सोलह संस्कार में आखरी संस्कार है मृत्यु संस्कार. मानव जीवन नश्वर होता है यह हम सभी जानते हैं. मानव जीवन उपरान्त मृत्यु एक अटल सत्य है.

भारतीय संस्कृति या यूँ कहें कि हिन्दू धर्म या परम्परा को पूरी दुनिया मानती है और जानती है  है लेकिन, इस परम्परा से पूरी दुनिया विस्मित भी होती है. इस परम्परा की बात ही अनोखी है. पौराणिक धर्म ग्रंथों में ‘शिव’ की चर्चा की गई है. आखिर शिव है क्या…? ‘शव’ से ही शिव की उत्पत्ति हुई है ऐसा हम सभी मानते और जानते हैं. पौराणिक धर्म ग्रंथों में इसकी विस्तृत चर्चा की गई है. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ‘श्मशान’ में ‘भगवान शिव’ का निवास स्थान माना जाता है. उस स्थान पर मृत्यु उपरान्त आखरी कर्म किए जाते हैं.

हिन्दू परम्परा जितना पुराना है उतना ही पुराना इसका इतिहास भी है. प्राचीन काल से ही पूर्वजों ने दैहिक कर्म या यूँ कहें जीवन के आखरी कर्म ‘मृत्यु’ के अटल सत्य की विवेचना की है. मृत्यु उपरान्त ‘शव’ के आखरी मंजिल श्मशान में जाते हैं. ‘श्मशान’ जहाँ नि:स्तब्ध शांति होती है.यहाँ चारो तरफ दुःख, शोक और गम से भरा-पूरा होता है.

हिन्दू धर्म और भारतीय इतिहास के गर्भ में अनुपम कृतियाँ मौजूद है जिसे हम सभी भारतवासी ना के बराबर ही जानते हैं. आज हम बात कर रहे हैं ‘घाटों के शहर’ की. इस शहर के बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम ही होगा. इस शहर का वर्णन पौराणिक धर्मग्रन्थों में हुआ है. इस शहर का इतिहास जितना पुराण है उतना ही यहाँ की परम्परा भी अनोखी है. इस  शहर का नाम है ‘वाराणसी’ जिसे हम सभी ‘काशी’ के नाम से भी जानते है. उत्तरप्रदेश के दक्षिन-पूर्व कोने में वरुणा, भगीरथी और गंगा के संगम पर बसा एक नगर है. पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार, इस नगर का एक नाम ‘माधव पूरी’ भी है.

वैदिक काल से ही ये नगर भगवान शिव की उपासना का प्राचीन केंद्र रहा है. यहाँ भगवान विश्वनाथ का अति प्राचीन मंदिर है. भगवान विश्वनाथ के आलावा संकटमोचन, आदिकेशव सहित अन्य देवी-देवताओं के भी मंदिर है. काशी के घाटों का दृश्य बड़ा मनोरम और अनुपम होता है. यहाँ के प्रसिद्ध घाटों में दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र और तुलसी घाट हैं.

मणिकर्णिका घाट:- पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, माता पार्वती के कर्णफुल यहाँ के कुंड में गिर गया था और भगवान शंकर ने उस कर्णफूल को खोजा था जिसके कार यहाँ का नाम मणिकर्णिका पड़ा. दूसरी मान्यता यह है कि, माता पार्वती के पार्थिव शरीर को भगवान शंकर द्वारा अंतिम संस्कार किया गया था जिसके कारण इसे महाश्मशान भी कहते हैं.इस घाट की विशेषता यह है कि यहाँ 24 घंटे चिता की लगातार अग्नि जलती रहती है.

महाश्मशान के बारे में कहा जाता है कि, यहाँ नगरवधूयें आकर नृत्य और संगीत से बाबा औघरदानी (मसान) को प्रसन्न करती हैं. पुरे वर्ष के 362 दिनों तक अपने लिए नृत्य करती है लेकिन, वर्ष के 03 दिन बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न के लिए नृत्य और संगीत करती हैं. यह परम्परा अचानक यूँ ही नहीं शुरू हुआ बल्कि यह परम्परा करीब चार सौ साल पुराना है.

बताते चलें कि, 16वीं शताब्दी से काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर शुरू हुई यह परम्परा वर्तमान समय लगातार चली आ रही है. कार्यक्रम के अध्यक्ष चैनु प्रसाद गुप्ता ने बताया कि, यह परम्परा अकबर काल में राजा मान सिंह ने शुरू करवाया था. 16वीं शताब्दी में राजा मान सिंह ने शमशान नाथ मन्दिर का निर्माण करवाया. मन्दिर के बन जाने के बाद यहाँ काफी समय तक भजन-कीर्तन होता था. लेकिन, शमशान की नि:स्तब्ध शांति, दुःख, शोक और गम को दूर करने के लिए अध्यक्ष चैनु प्रसाद गुप्ता के वंशजों ने राजा मान सिंह से आग्रह किया की महाराज कुछ ऐसा किया जाय कि लोगों का दुःख, शोक और गम दूर हो. तब राजा मान सिंह ने शमशान में संगीतांजली का प्रोग्राम रखा और सभी कलाकरों को निमन्त्रण  भेजा लेकिन, कोई भी कलाकार यहां आने को तैयार नहीं हुआ.

उसके बाद राजा ने पुरे शहर में एलान करवा दिया उसके बाद भी कोई आने को तैयार नहीं हुआ. तब राजा मान सिंह ने नगर वधुओं को यह निमन्त्रण भेजा और कहा कि, जो भी नगर वधु यहाँ नृत्य करेगी उसे अगले जन्म में नगरवधू नहीं बनाना पड़ेगा. जिसके बाद नगर वधुओं ने यह निमत्रण स्वीकार कर लिया. उसके बाद नगरवधूओं ने तयशुदा समय पर आकर महाश्मशान बाबा का दरबार में बाबा की पूजा की उसके बाद महाश्मशान बाबा के सामने पूरी रात नृत्य कर बाबा को प्रसन्न किया.

कार्यक्रम के अध्यक्ष चैनु प्रसाद ने बताया कि, हर साल चैत्र शुक्ल पंचमी से शुरू होकर चैत्र शुक्ल सप्तमी तक महाश्मशान बाबा का दरबार गुलजार होता है. उन्होंने कहा कि, तीन दिवसीय वार्षिक श्रृगार महोत्सव के पहले दिन रुद्राभिषेक, दुसरे दिन भोग आरती के बाद भंडार और संध्या में तंत्र पूजन व भक्ति जागरण जबकि, तीसरे और आखरी दिन महाश्मशान बाबा की आरती उसके बाद नगर वधुओं का नृत्य होता है.

कार्यक्रम के अध्यक्ष चैनु प्रसाद ने बताया कि, तब से लेकर यह परम्परा चली आ रही है लेकिन, समय के बदलाब के साथ-साथ अब पुरे भारतवर्ष से कलाकार स्वेच्छा से यहाँ आकर महाश्मशान बाबा के दरबार में गीत-संगीत और नृत्य पेश करते हैं. वर्ष 2019 के वार्षिक महोत्सव में काशी घराने के गायक ‘जय पाण्डेय’ और पद्मश्री डॉ० शोमा घोष (बिस्मिल्लाह खान की मानस पुत्री) ने भी अपने गीत और संगीत महाश्मशान बाबा के दरबार में पेश किया.

काशी घराने के गायक ‘जय पाण्डेय’ ने

  • ॐ मंगलम, ओमकार मंगलम, शिव मंगलम, शिवनाम मंगलम…. ॐ नम: शिवाय
  • तेरे भरोसे मेरी गाड़ी, तू जाने तेरा नाम जाने, बाबा ओ बाबा हमे शरण में रखना
  • मुस्कुराने की वजह तुम हो…

वहीं पद्मश्री डॉ० शोमा घोष ने कार्यक्रम की शुरुआत ठुमरी से की, अंतिम प्रस्तुती शिव तांडव स्त्रोत की.

डॉ० शोमा घोष ने कहा कि, जब राजा मान सिंह ने कलाकारों को बुलाया था तब उस वक्त के कलाकारों ने महाश्मशान बाबा के दरबार में गीत-संगीत का प्रोग्राम पेश करने से मना कर दिया था लेकिन, ‘मै’ वो परम्परा को तोड़ कर महाश्मशान बाबा के दरबार में गीत-संगीत का प्रोग्राम पेश कर रही हूँ.

महाश्मशान बाबा के दरबार में गीत-संगीत व नृत्य के लिए भारी संख्या में देशी-विदेशी दर्शक मौजूद रहते है. और यह कार्यक्रम पूरी रात चलती रहती है जिसमे बाबा के साथ दर्शक सुध-बुध खोकर जलती चिताओं के बीच कार्यक्रम का आनंद लेते हैं.

                                                                         छायाचित्र :- जेपी