मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व…

मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व…

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संक्राति का अर्थ होता है सूर्य के एक राशि से दुसरे राशि में प्रवेश करना या यूँ कहें कि, एक राशि से दुसरे राशि में गमन करना. फोटो:-गूगल.

देश ही नहीं विदेशों में भी मकर संक्रान्ति का पर्व अलग-अलग रीति-रिवाजों द्वारा बड़े ही  धूमधाम से मनाया जाता है. संक्रान्ति के बाद ही वसंत ऋतू का आगमन शुरू हो जाता है. संक्राति का अर्थ होता है सूर्य के एक राशि से दुसरे राशि में प्रवेश करना या यूँ कहें कि, एक राशि से दुसरे राशि में गमन करना. ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है.

मकर संक्रान्ति के पर्व को देश और विदेशों में कई नामों से पुकारते हैं जैसे पश्चिम बंगाल में पौष संक्रान्ति, बिहार और उत्तर प्रदेश में खिचड़ी, असाम में बिहू, हरियाणा और पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडू और श्रीलंका में पोंगल जबकि, नेपाल में माघे संक्रान्ति, बांग्लादेश में पौष संक्रान्ति, थाईलैंड में सोंगकरन…     

मकर संक्रान्ति में मकर का भी विशेष महत्व होता है. पुरानों के अनुसार मकर की अलग-अलग विवेचना की गई है. चुकीं मकर मत्स्य वर्ग में आता है और माँ गंगा का वाहन भी है और गंगा को मकरवाहिनी भी कहते है. वायुपुराण के अनुसार, मकर को नौ निधियां भी कहते हैं. ये नौ निधियां हैं   पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द नील और खर्व. पृथ्वी की एक अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं जबकि, ज्योतिष गणना के बारह राशियों में से दसवीं राशि का नाम मकर है. श्रीमद्भागवत के अनुसार, सुमेरु पर्वत के उत्तर में दो पर्वत हैं उनमें से एक का नाम मकर पर्वत भी है. पुरानों के अनुसार, कामदेव की पताका का प्रतीक होता है मकर इसीलिए, कामदेव को मकरध्वज भी कहा जाता है.

मकर संक्रान्ति का धार्मिक ग्रन्थों में विस्तार से वर्णन किया गया है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार,दक्षिनायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. महाभारत पुराण में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है कि, शर–शैय्या पर पड़े गंगापुत्र भीष्म से दर्शन करने आये ऋषियों से सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने शरीर-त्याग करने का संकल्प दुहराते हैं. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का एक दिन एवं दक्षिणायन एक रात्रि मानी जाती है.मकर संक्रान्ति के दिन गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे हुए कपिल मुनि के आश्रम होते हुए सागर में जाकर मिल गई थी. मकर संक्रान्ति का वैज्ञानिक महत्व यह है कि, संक्रान्ति के समय नदियों में वाष्पन क्रिया होती है. उत्तरायण में सूर्य का ताप शीत के प्रकोप को कम करता है  और इस दिन से रातें  छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं.  

सूर्य जब उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है तब रवी की फसल चना, गेहूं आदि फसल पकने की स्थिति में होती है. इस समय सूर्य के ताप से उन फसलों को बढ़ने और पकने में सहायता मिलती है. यही कारण है कि मकर संक्रान्ति के लोकपर्व पर लोग अन्य को सूर्य भगवान को अर्पित करते है. लोक व्यवहार में भी तिल-खिचड़ी आदि गर्म पदार्थों के सेवन पर विशेष जोर दिया जाता है. जबकि हमारे ऋषियों ने सुखी जीवन के लिए अनेकानेक विधाओं का उल्लेख किया है उसमे नदी स्नान का विशेष महत्व दिया गया है. बताते चलें कि, नदियों के उद्गम स्थान पर्वत होते हैं, जहाँ से ये नदियाँ निकलती हैं और इन्हीं पर्वतों पर दिव्य औषधियाँ भी फलती-फूलती हैं उनमे वर्षा के जल में मिलकर नदियों में गिरती हैं. जिसके कारण नदी के पानी में स्नान का महत्व और भी बढ़ जाता है.

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, संक्रान्ति का व्रत करना चाहिए. संक्रान्ति के पहले दिन एक बार भोजन करना चाहिए. संक्रान्ति के दिन तेल तथा तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए. मकर संक्रांत‌ि के द‌िन उड़द दाल में ख‌िचड़ी बनाकर खाएं व दान करें. मकर संक्रांति के समय उत्तर भारत में ठंड का समय रहता है, ऐसे में तिल-गुड़ का सेवन करने पर शरीर को ऊर्जा मिलती है. संक्रान्ति के दिन खिचड़ी का सेवन करने से पाचन क्रिया को दुरुस्त करती है. यह पर्व सेहत के लिहाज से बहुत ही फायदेमंद होता है.