भीमसेनी एकादशी…

भीमसेनी एकादशी…

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एक ही दशा में रहते हुए अपने आराध्य का पूजा, अर्चना व वन्दना करने वाले व्रत को ही एकादशी कहते हैं.

ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।।

 

वालव्याससुमनजी महाराज प्रवचन के दौरान एकादशी की चर्चा करते हुए कहा कि “अमावस्या” और “पूर्णिमा” के दस दिन बाद ग्यारहवीं तिथि को ही ‘एकादशी’ कहते है. एकादशी का व्रत पुण्य संचय (जमा) करने में सहायक होता है. प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना अलग ही महत्त्व होता है. एकादशी व्रत का अर्थ  है कि, “एक ही दशा में रहते हुए अपने आराध्य का पूजा, अर्चना व वन्दना करने वाले व्रत को ही एकादशी कहते हैं. इस व्रत में स्वाध्याय की सहज वृत्ति अपनाकर अपना मन ईश्वर की आराधना में लगना और दिन-रात केवल भगवान का ही चितंन करना, इसी को एकादशी का व्रत करना माना जाता है. स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्नदान, गौ दान, कन्यादान आदि करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, एवं ग्रहण के समय स्नान–दान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, कठिन तपस्या, तीर्थयात्रा एवं अश्वमेघ यज्ञ  आदि करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, इन सब सबसे अधिक पुण्य एकादशी व्रत करने से प्राप्त होता है. साल में चौबीस एकादशियाँ होती हैं. जब अधिकमास या मलमास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है. ज्येष्ठ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही “निर्जला एकादशी”  कहते हैं, इस व्रत मे पानी का पीना वर्जित होता है इसिलिये इसे निर्जला एकादशी कहते है.

सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया, तो महाबली भीम ने निवेदन किया- पितामह… आपने तो प्रति पक्ष में एक दिन के उपवास की बात की है, मैं तो एक दिन क्या एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है. तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाऊँगा ? पितामह ने भीम की समस्या का निदान करते हुए और उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- नहीं कुंतीनंदन, धर्म की यही तो विशेषता है कि, वह सबको धारण ही नहीं करता, सबके योग्य साधन व्रत-नियमों की बड़ी सहज और लचीली व्यवस्था भी उपलब्ध करवाता है. अतः आप ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा. निःसंदेह तुम इस लोक में सुख, यश और धन भी प्राप्त कर साथ ही मोक्ष-लाभ भी प्राप्त कर लोगे.

इतने आश्वासन पर ही भीमसेन भी इस एकादशी का विधिवत व्रत करने के लिए सहमत हो गए. इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को लोक में पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है. इस दिन जो स्वयं निर्जल रहकर ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को शुद्ध पानी से भरा घड़ा का दान करना चाहिए. एक बार महर्षि व्यास पांडवो के यहाँ पधारे, भीम ने महर्षि व्यास से कहा, भगवान… युधिष्ठर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुन्ती और द्रौपदी सभी एकादशी का व्रत करते हैं, और मुझसे भी व्रत रख्ने को कहते हैं, परन्तु मैं बिना खाए रह नही सकता हूँ, इसलिए चौबीस एकादशियो पर निरहार रहने का कष्ट साधना से बचाकर मुझे कोई ऐसा व्रत बताईये, जिसे करने में मुझे विशेष असुविधा न हो, और सबका फल भी मुझे मिल जाये. महर्षि व्यास जानते थे कि, भीम के उदर में बृक नामक अग्नि है, इसलिए अधिक मात्रा में भोजन करने पर भी उसकी भूख शान्त नहीं  होती है, महर्षि ने भीम से कहा तुम, ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का व्रत रखा करो. इस व्रत में स्नान आचमन में पानी पीने से दोष नहीं होता है, और इस व्रत से अन्य तेईस एकादशियो के पुण्य का लाभ भी मिलेगा, इसीलिए तुम जीवन पर्यन्त इस व्रत का पालन करो, भीम ने बडे साहस के साथ निर्जला एकादशी व्रत किया, जिसके परिणाम स्वरूप प्रातः होते-होते वह संज्ञाहीन हो गये, तब युधिष्ठिर ने गंगाजल, तुलसी व चरणामृत प्रसाद, देकर उनकी मुर्छा दुर की. इसलिए इस एकादशी को “भीमसेन एकादशी” भी कहते हैं.

व्रत विधि :-

एकादशी के पूर्व दशमी को रात्री में एक बार ही भोजन करना आवाश्यक है उसके बाद दुसरे दिन सुबह उठ कर स्नान आदि कार्यो से निवृत होने के बाद व्रत का संकल्प भगवान विष्णु के सामने संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना करें. भगवान विष्णु की पूजा के लिए धूप, दीप, फल और पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए. भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए विधिपूर्वक पूजन करें. ध्यान दें…. एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणो को अन्न दान, जनेऊ व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

पूजन सामाग्री :-

वेदी, कलश, सप्तधान, पंच-पल्लव, रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल,  दूध,  दही,  गाय के घी का दीपक, सुपाड़ी, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, नीबूं, नवैध, केला और तुलसी पत्र व मंजरी.

यह व्रत पर स्त्री-पुरुष दोनो को ही करना चाहीए, जलपान के निषिद्ध होने पर भी फलहार के साथ दुध लिया जा सकता है, इस दिन निर्जला व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु की अराधना का विशेष महत्व होता है. इस दिन ऊँ नमो भगवते वासुदेवायः के मन्त्र का जाप करना चाहिए.

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

 

वालव्याससुमनजीमहाराजमहात्मा भवन,

श्रीरामजानकी मंदिरराम कोट,

अयोध्या. 8544241710.