Dhram Sansar

भाई दूज व चित्रगुप्त पूजा…

पांच दिनों के पर्वो की श्रृंखला के आखरी दिन कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष द्वितीया या यूँ कहें यम द्वितीया भी कहते हैं. इस दिन दो पर्व एकसाथ मनाई जाती है- क. भाई दूज ख. चित्रगुप्त पूजा…

भाई दूज:-

भाई दूज जैसा की नाम से ही पता चलता है कि यह पर्व भाई और बहन के रिश्ते पर आधारित पर्व है जो परस्पर प्रेम और श्रद्धा से मनाया जाता है. मान्यता है कि, यम द्वितीया के दिन भाई अपने बहन के घर जाता है और बहन से तिलक लगवाकर उपहार देता है.

कथा:- भगवान सूर्य की पत्नी छाया के एक बेटा- बेटी थीं जिसका नाम यमराज और यमुना(यमी). बहन यमी अपने भाई यमराज से निवेदन करती कि वे उसके हाथ का बना भोजन कर लें, लेकिन यमराज अपनी व्यस्तता के कारण अपनी बहन की बात ताल जाते थे. एक दी यमराज अपनी बहन के घर पहुचें उस दिन यम द्वितीया थी, अपने भाई यमराज को अपने घर खड़ा देखकर आनंद से प्रफुलित होकर अपने भाई का स्वागत किया और भोजन करवाया. स्वागत-सत्कार से प्रसन्न होकर यमराज ने बहन को वर मागने के लिए कहा. यमी ने अपने भाई यमराज से कहा जो भाई आज के दिन अपनी बहन के घर आकर तिलक लगवाएगा उसे आपका भी भय ना हो. भाई यमराज “तथास्तु” कहकर यमपुरी चले गये.

चित्रगुप्त पूजा:-

चित्र इद राजा राजका इदन्यके यके सरस्वतीमनु।
 पर्जन्य इव ततनद धि वर्ष्ट्या सहस्रमयुता ददत ॥ 

यम द्वितीया के दिन ही चित्रगुप्त पूजा भी मनाई जाती है. यह पर्व कायस्थ वर्ग में अधिक प्रचलित है चुकिं, इनके ईष्ट देवता भगवान चित्रगुप्तजी हैं. धर्म ग्रन्थों के अनुसार धर्मराज चित्रगुप्तजी भगवान यमराज के दरवार में मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखते हैं और न्याय करते हैं.

कथा:-

पुरातन समय में सौराष्ट्र राज्य के राजा जिनका नाम सौदास था, वो बड़ा ही पापी और अधर्मी था, उसने कभी भी कोई पूण्य का काम नहीं किया था. एक बार शिकार खेलते समय जंगल में भटक गया, और रास्ता खोजते हुए आगे बढ़ा तो उसने देखा कि एक ब्राह्मण पूजा कर रहे हैं. राजा ब्राह्मण के पास गया और उनसे पूछा की आप किनकी पूजा कर रहें है. ब्राह्मण ने कहा आज कार्तिक शुक्ल द्वितीया है इस दिन मैं यमराज और चित्रगुप्त महाराज की पूजा कर रहा हूं, इनकी पूजा नरक से मुक्ति प्रदान करने वाली है. राजा ने तब ब्राह्मण से पूजा की विधि पूछकर वहीं चित्रगुप्त और यमराज की पूजा की.

समय के अंत में यमदूत राजा के प्राण लेने आ गये और, दूत राजा की आत्मा को जंजीरों में बांधकर घसीटते हुए ले गये. लहुलुहान राजा यमराज के दरबार में जब पहुंचा, उस वक्त चित्रगुप्त ने राजा के कर्मों की पुस्तिका खोली और कहा कि, हे यमराज यूं तो यह राजा बड़ा ही पापी है और इसने सदा पाप कर्म ही किए हैं, परंतु इसने कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को हमारा और आपका व्रत पूजन किया है अत: इसके पाप कट गये हैं और अब इसे धर्मानुसार नरक नहीं भेजा जा सकता है, इस प्रकार राजा को नरक से मुक्ति मिल गई और राजा स्वर्ग चला गया.

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