भगवान सूर्य देव…

भगवान सूर्य देव…

14
0
SHARE
भगवान सूर्य की पूजा करने से जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है.

पौराणिक धार्मिक ग्रंथों के अनुसार ,भगवान सूर्य समस्त जीव-जगत के आत्मस्वरूप और अखिल सृष्टि के आदि कारण भी हैं. भगवान सूर्य के माता-पिता हैं, महर्षि कश्यप और अदिति. अदिति के पुत्र होने के कारण ही उनका एक नाम आदित्य पैतृक नाम के आधार पर वे काश्यप के नाम से प्रसिद्ध हुए.

                                      ।।ॐ घृणि सूर्य आदित्य ॐ ।।

भगवान सूर्य की पूजा में विशेष महत्व होता है अर्घ्य-दान का. अगर साधक प्रतिदिन प्रात:काल रक्तचन्दनादि, ताम्रपात्र में जल, लाल चन्दन, चावल, रक्तपुष्प और कुशादि रखकर सूर्यमन्त्र का जप करते हुए भगवान सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए. अर्ध्यदान से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य आयु, आरोग्य, धन-धान्य, यश, विद्या, सौभाग्य, मुक्ति- प्रदान करते हैं.

                                  ।।ॐ एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।।

                                  ।।अनुकम्पय माँ भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर है।।

 भगवान सूर्य की पत्नी का नाम संज्ञा है जो भगवान विश्वकर्मा की पुत्री है. संज्ञा के दो पुत्र और एक कन्या हुई- श्राद्धदेव,वैवस्तमनु और यमराज  तथा यमुनाजी. संज्ञा भगवान सूर्य के तेज़ को सहन नहीं कर पाती थी इसीलिए उसने अपनी छाया उनके पास छोड़ दी और स्वयं तप करने लगी. छाया से शनैश्चर, सावर्णि मनु और तपती नामक कन्या हुई. भगवान सूर्य को अचेतन रहने के कारण उन्हें “मार्तण्ड” भी कहा जाता है, उनका एक नाम ‘हिरण्यगर्भा’ भी है.

भगवान सूर्य ग्रहों और नक्षत्रो के स्वामी भी है और अपनी चाल की विभिन्न गतियों से चलते हुए समयानुसार दिन, नक्षत्र, महीने और साल बदलते रहते हैं. ज्योतिष के अनुसार सूर्य सबसे तेजस्वी, प्रतापी और सत और तमो गुण वाला ग्रह कहा गया है. यह आत्मा का कारक और हृदय या यूँ कहें कि, नाड़ी संस्थान का अधिपति माना जाता है. उन्हें सत्व गुण का माना जाता है और वे आत्मा, राजा, ऊंचे व्यक्तियों या पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं. पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाता था, सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसन्धान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव में पाया कि, छठ पर्व के दिन सूर्य की किरणों में रोगाणुओं के मारने की क्षमता अधिक होती है. भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था और  इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गयी, जिसके बाद शाम्ब को कुष्ठ रोग ठीक हो गया.

धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों में ऐसे कई कहानियाँ मौजूद हैं. भगवान सूर्य की पूजा करने से जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है साधक को नई ऊर्जा प्राप्त होती है. साधक के जीवन से निराशा दूर कर नई रौशनी का संचार होती है.