बैण्ड मास्टर…

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कठिन मेहनत से ही सफलता मिलती है जो स्थाई होती है.

प्रेमचंद रंगशाला में सोमवार की शाम ग्रीन रूम द्वारा दो दिवसीय नाटय ग्रीन रूम नाट्योत्स्व  महोत्सव२०१७ का उदघाटन केन्द्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रामकृपाल यादव, आकाशवाणी (पटना) के डाइरेक्टर डा0 किशोर सिन्हा और शिक्षाविद अरुणोदय ने किया. नाट्योत्स्व के पहले दिन “बैण्ड मास्टर” प्रशांत चटर्जी द्वारा लिखित और रवि मिश्रा के निर्देशन में इस नाटक का मंचन किया गया. बैण्ड मास्टर के जीवन से जुड़ी कुछ दृश्यों का जीवंत नाटक प्रस्तुत  करने की कोशिस “अदाकार ख्वाहिश सांस्कृतिक दर्पण” की टीम ने किया , मुख्य भूमिका में रवि मिश्रा ने “बैंड मास्टर नरसु मियाँ” का अहम किरदार निभाया, साथ ही “हजरत” का किरदार आजाद शक्ति, “अली” का सुभाष चंद्रा, “मुबारक” का ओम कपूर “मालिक” की भूमिका दीपक श्रीवास्तव व अन्य….

“बैण्ड मास्टर” को अमूमन आप सभी शादि-ब्याह या पार्टी में इनका अहम रोल होता है, लेकिन उनका अपना निजी जीवन कड़ी-मेहनत और संघर्ष के साथ ही जीवन-यापन करते है. बैण्ड मास्टर की कहानी के अनुसार मास्टर नरसु मियाँ संगीत का अच्छा जानकार है लेकिन अपनों की उपेक्षा से परेशान व दुखी रहता था. जैसे-जैसे बुढा हो रहा था लेकिन उसके साथी व आसपास के लोग उस पर शक किया करते थे, लेकिन उसका शागिर्द हुसैन को हमेशा ही साहनभूति रहती है. मास्टर नरसु मियाँ का बेटा अली जो बूढ़े का पाला-पोसा बेटा है और क्लैरनेंट बजाने का उस्ताद है, लेकिन बैण्ड मास्टर वर्ग की उपेक्षा की वजह से दूर रजिया के प्रेम में मसगुल था, दूसरी तरफ हजरत जिसे क्लैरनेंट बजाने का अधुरा ज्ञान था फिर भी बूढ़े से मास्टरी छिनकर मास्टर बनना चाहता था और झगड़े कर व परिस्थितिवस मालिक की चापलूसी कर मास्टर बन जाता है

सटटे की बात करने आये ग्राहक के अनुरोध पर अच्छी धुन ना सुनाने की वजह से गाहक हंगामा करता हुआ सभी को बेइज्जती करता है, उधर दूकान की इज्जत जाती देख मालिक ग्राहक को रोकता है. दूकान की इज्जत जाती देखकर बुढा बैण्ड मास्टर संगीत की अच्छी धुन सुनाता हुआ… आखरी सफर की ओर बढ़ जाता है और जाने पहले हजरत को रियाज करने व बेटे अली को मास्टर बनाकर सबको छोड़ दूर चला जाता है.

बैण्ड मास्टर के मंचन में कलाकार आपस में होड़ करते नजर आये… व साथी कलाकारों के अनुभव की कमी भी साफ़-साफ़ दिखी. मुख्य भूमिका में मास्टर नरसु मियाँ का किरदार(रवि मिश्रा)के अंश में शुरुआत उन्होंने अच्छी की … लेकिन आगे चलकर कमजोर हो गये. कुछ जगहों पर रवि मिश्रा ने जीवंत करने की कोशिस की. “हजरत” बने आजाद शक्ति ने अपने किरदार का बड़े ही बोल्ड अंदाज में जीवंत मंचन किया. मास्टर नरसु मियाँ और हजरत के किरदार व संवाद को देखकर प्रेक्षागृह में बैठे दर्शकों को “शक्ति फिल्म” का वो संवाद जो अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार के बीच फिल्माया गया था वो याद आ गया. इस नाटक से सबक मिलता है कि कठिन मेहनत से ही सफलता मिलती है जो स्थाई होती है.