ताना-बाना…

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सिक्खों के सातवें गुरु हररायजी , संगीतकार ओ०पी० नैय्यर अभिनेत्री सह टीवी कलाकार कामिनी कौशल का जन्म हुआ था. फोटो:-गूगल

भारतीय इतिहास को अगर देखें तो 16 जनवरी के दिन सिक्खों के सातवें गुरु हररायजी का जन्म वर्ष 1630 में हुआ था. वहीं, हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार ओ०पी० नैय्यर का जन्म 16 जनवरी 1926 साथ ही प्रसिद्ध अभिनेत्री सह टीवी कलाकार कामिनी कौशल वर्ष 1927 एवं  अभिनेता कबीर बेदी वर्ष 1946  को हुआ था.

ओ०पी० नैय्यर:-

हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार ओ०पी० नैय्यर का पूरा नाम ओंकार प्रसाद नैय्यर  था. नैय्यर  का जन्म  लाहौर (पकिस्तान) के एक मध्यम परिवार में हुआ  था. नैय्यर का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था और वो पार्श्वगायक बनना चाहते थे. भारत विभाजन के बाद उनका परिवार लाहौर छोड़कर अमृतसर चला आया. नैय्यर ने संगीत की सेवा करने के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ दी. उन्होंने संगीत के सफ़र की शुरुआतआल इंडिया रेडियो से की. फ़िल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिये नैय्यर वर्ष 1949 में  मुंबई आकर निर्माता निर्देशक कृष्ण केवल की फ़िल्म ‘कनीज़’ के बैक ग्राउंड संगीत को दिया।

बतौर संगीतकार उन्होंने फ़िल्म ‘आसमान’ से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की जंहा उनका पहला गाना ‘इस बेवफा जहां में वफा ढूंढते हैं’ रिकार्ड करवाया।

फ़िल्म आरपार में नैय्यर के निर्देशन में संगीतबद्ध गीत सुपरहिट हुए और अपनी पहचान बनाने में सफल हुये। उसके बाद उनके संगीत निर्देशन में एक के बाद एक कई गाने सुपर हिट हुये जैसे :-

  • ‘जाने कहां मेरा जिगर गया जी’
  • ‘ठंडी हवा काली घटा’
  • बाबूजी धीरे चलना प्यार में ज़रा संभलना
  • ये देश है वीर जवानों का जैसे कई गाने सुपर हिट हुए.

कामिनी कौशल:-

मशहुर अभिनेत्री सह टीवी कलाकार कामिनी कौशल का जन्म 16 जनवरी, 1927 को लाहौर (पकिस्तान) में हुआ था. उनके पिता क नाम प्रोफ़ेसर शिवराम कश्यप थ जौ एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के जाने-माने वनस्पति शास्त्री थे और लाहौर के ही ‘गवर्नमेंट कॉलेज’ में पढ़ाते थे.अंतर्राष्ट्रीय स्तर के जाने-माने वनस्पति शास्त्री थे और लाहौर के ही ‘गवर्नमेंट कॉलेज’ में पढ़ाते थे.दो भाई और तीन बहनों में सबसे छोटी कामिनी कौशल के बड़े भाई डॉक्टर के. एन. कश्यप बतौर सर्जन कई सालों तक पी. जी. आई. चंडीगढ़ से जुड़े रहे.

एक ऐसी  कलाकार, जिसने अपनी शालीनता से सभी का दिल जीत लिया था. उनका वास्त्विक नाम उमा कश्यप था. उन्होंने कईं यादगार फ़िल्में दी जिनमें ‘नीचा नगर’ और ‘बिराज बहू’ में निभाई गई भूमिका के लिए जाना जाता है. बतौर चरित्र अभिनेत्री कामिनी कौशल के दूसरे फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत फिल्म  ‘शहीद’ से हुई. इस फिल्म की सफलता के बाद मनोज कुमार की लगभग सभी फ़िल्मों में उनकी माँ की भूमिका की.बतौर चरित्र अभिनेत्री 40 से भी ज़्यादा सालों तक सक्रिय रहीं. उन्होने “वक़्त की रफ़्तार’, ‘ऊपरवाली घरवाली’, ‘संजीवनी’, ‘शन्नो की शादी’  जैसे हिन्दी धारावाहिकों में अभिनय किया. वर्ष 2007  में बनी ‘लागा चुनरी में दाग’ कामिनी कौशल की अभी तक की आख़िरी हिन्दी फ़िल्म थी.

गुरु हररायजी:-

सिक्खों के सातवें गुरु हररायजी का जन्म वर्ष 1630 में कीरतपुर रोपड़ हुआ था.गुरू हरराय जी एक महान आध्यात्मिक व राष्ट्रवादी महापुरुष एवं एक योद्धा भी थे. उनकी माता का नाम निहाल कौर एवं, बाबा गुरदित्ता जी थे. गुरू हरगोविन्द साहिब जी ने मृत्यू से पहले, अपने पोते हरराय जी को 14 वर्ष की छोटी आयु में 03 मार्च 1644 को ‘सप्तम्‌ नानक’ के रूप में  घोषित किया था.

गुरू हररायजी का विवाह माता किशन कौर जी, जो कि अनूप शहर (बुलन्दशहर), उत्तर प्रदेश के दया राम जी की पुत्री थी.गुरू हररायजी का शांत व्यक्तित्व लोगों को प्रभावित करता था.उन्होंने अपने दादा गुरू हरगोविन्द साहिब जी के सिख योद्धाओं के दल को पुनर्गठित किया।उन्होंने सिख योद्धाओं में नवीन प्राण संचारित किए साथ ही आध्यात्मिक पुरुष होने के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी थे. उनके राष्ट्र केन्द्रित विचारों के कारण मुगल औरंगजेब को परेशानी हो रही थी. वो हमेशा ही अहिंसा परमो धर्म के सिद्धान्त को अहम मानते थे.

गुरू हररायजी ने अनसुधान केन्द्र की भी  स्थापना की थी. एक बार दारा शिकोह किसी अनजानी बीमारी से ग्रस्त हुआ और हर प्रकार के सबसे बेहतर हकीमों से भी सलाह ली केकिन, कोई फायदा ना हुआ. अंत में गुरू साहिब की कृपा से उसका ईलाज हुआ और उसकी जान बची.

गुरू हररायजी ने  लाहौर, सियालकोट, पठानकोट, साम्बा, रामगढ एवं जम्मू एवं कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों का प्रवास भी किया और 360 मंजियों की स्थापना की. गुरू हरराय साहिब ने अपने गुरूपद काल के दौरान बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया। भ्रष्ट मसंद, धीरमल एवं मिनहास जैसों ने सिख पंथ के प्रसार में बाधाएं उत्पन्न की.शाहजहां की मृत्यु के बाद गैर मुस्लिमों के प्रति शासक औरंगजेब का रूख और कड़ा हो गया.

मुगल शासक औरंगजेब ने सत्ता संघर्ष की स्थितियों मेंदारा शिकोह की मदद को राजनैतिक बहाना  बनाकर गुरू साहिब पर बेबुनियाद आरोप लगाये और उन्हें दिल्ली में पेश होने का हुक्म दिया।गुरू हरराय साहिब जी के बदले रामराय जी दिल्ली गये और रामराय जी ने मुगल दरबार में गुरबाणी की त्रुटिपूर्ण व्याख्या की.उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों एवं गुरु मर्यादा की दृष्टि से यह सब निन्दनीय था जिसके कारणराम राय जी को तुरंत सिख पंथ से निष्कासित किया।

राष्ट्र के स्वाभिमान व गुरुघर की परम्पराओं के विरुद्ध कार्य करने के कारण रामराय जी को यह कड़ा दण्ड दिया गया. इस घटना ने सिखों में देश के प्रति क्या कर्तव्य होने चाहिए, ऐसे भावों का संचार हुआ.इस घटना के बाद से ही सिख गुरु घर की परम्पराओं के प्रति अुनशासित हो गए.

इस प्रकार गुरू साहिब ने सिख धर्म के वास्तविक गुणों, जो कि गुरू ग्रन्थ साहिब जी में दर्ज हैं, गुरू नानक देव जी द्वारा बनाये गये किसी भी प्रकार के नियमों में फेरबदल करने वालों के लिए एक कड़ा कानून बना दिया।अपने अन्तिम समय को नजदीक देखते हुए उन्होने अपने सबसे छोटे पुत्र गुरू हरकिशन जी को अष्टम्‌ नानक’ के रूप में स्थापित किया.