तपेदिक दिवस…

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ऋगवेद में क्षय रोग को यक्षमा कहा गया है जबकि, अथर्ववेद में इसे बालसा कहा गया है.फोटो:-गूगल.

आज पूरी दुनिया में तपेदिक या यूँ कहें कि, टीबी दिवस मनाया जा रहा है. टीबी का पूरा नाम “ट्यूबरोक्युलोसिस” होता है जो ‘मायकोबेक्टिरियम ट्यूबरोक्युलोसिस’ नामक जीवाणु के कारण होता है. इसे टीबी, तपेदिक, यक्ष्मा और क्षय नामों से जानते हैं. घातक संक्रामक बीमारी टीबी की पहचान जर्मन वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच ने 24 मार्च 1882 को हुई थी. उनकी इस खोज के लिए उन्हें 1905 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. 

पौराणिक धर्म ग्रंथों में भी टीबी, तपेदिक, यक्ष्मा और क्षय रोग का उल्लेख मिलता है. शिव पुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री के पति चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया था. वहीं, ऋगवेद में क्षय रोग को यक्षमा कहा गया है जबकि, अथर्ववेद में इसे बालसा कहा गया है. सुश्रुत संहिता में इस रोग का विस्तार से बचाब की जानकारी दी गई है. सुश्रुत संहिता के अनुसार, इस रोग के बचाब के लिए मां का दूध, मांस और शराब से दूर रहने की सलाह दी गई है साथ ही आराम करने की सलाह दी गी है.

ज्ञात है कि, क्षय रोग की खोज के पूर्व इस बीमारी को ‘पिशाच की बीमारी’ भी कहा जाता था. आम लोगों की अवधारणा थी कि, इस बीमारी से घर के किसी भी सदस्य की मौत हो जाती है तो इसका असर घर के दूसरे सदस्य पर भी होता है.

बताते चलें कि, टीबी की बीमारी एक संक्रामक बीमारी है जो संक्रमण खांसी, छींक या अन्य तरह के संपर्क से वायु द्वारा फैलता है.जब भी कोई व्यक्ति इस बीमारी से संक्रमित होता है और खुले तरीके से खाँसता या छींकता है, तो क्षयरोग पैदा करने वाले जीवाणु बाहर एरोसोल में प्रवेश कर जाते हैं और दुसरे व्यक्ति को जो उस परिवेश में हो उसे संक्रमित कर सकता है. इस बीमारी में आम तौर पर फेफड़ों में संक्रमण होता है.

इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं कि, किसी व्यक्ति को तीन सप्ताह से अधिक समय तक निरंतर खाँसी हो, खाँसी के साथ कफ आती हो, बुखार हो, भूख नहीं लगती हो साथ वजन भी कम हो रहा हो. यदि इनमें से कोई भी लक्षण तीन सप्ताह से अधिक अवधि तक बना रहे तो पीड़ित व्यक्ति को तुरंत डॉक्टर या नजदीकी डॉट्स टीबी केंद्र में जाकर अपने कफ की जाँच करवानी चाहिए.

टीबी की बीमारी कई तरह की होती है और यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकती हैं. समय पर सही इलाज न किया जाए तो यह रोग जानलेवा हो सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में वर्ष 2017 में एक करोड़ लोग टीबी की बीमारी के शिकार हैं जिनमे भारत में 27 प्रतिशत लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं. इस बीमारी से ग्रसित लोगों की संख्या इस प्रकार हैं… 58 लाख पुरुष, 32 लाख महिलाएं और 10 लाख बच्चे शामिल हैं. पूरी दुनिया में टीबी के कुल मरीजों की संख्यां में भारत में 27 प्रतिशत, चीन में 09 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 08 प्रतिशत, फिलीपींस में 06 प्रतिशत, पाकिस्तान में 05 प्रतिशत, नाइजीरिया में 04 प्रतिशत, बांग्लादेश में 04 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका में 03 प्रतिशत है.

टीबी की रोकथाम के लिए बीसीजी टीके का इस्तेमाल होता है. लेकिन, विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया से टीबी के ऐसे नमूने सामने आ रहे हैं जिन पर दवाइयों का असर खत्म होता जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, दवाइयों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता वाले टीबी के मामले बढ़ रहे हैं. इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है कि, टीबी का इलाज लंबा होता है और मरीजों को छह महीने तक दवाईयां लेनी पडती है. ज्यादातर मरीज लम्बे समय तक अपना  ईलाज जारी नहीं रख पाते हैं.