टैलेंट का मतलब ठेला गाड़ी…

टैलेंट का मतलब ठेला गाड़ी…

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लेकिन वर्तमान समय का आलम ये है कि अंगूठा छाप को डॉक्टरेट की डिग्री से सम्मानित किया जाता है, और पढ़े-लिखे को फेल से सम्मानित किया जाता है. फेल किये गये लोग जब अपने सम्मान की लड़ाई में दर-दर की ठोकर खा रहें हैं या उनलोगों को लाठियों से कुटाई की जा रही हैं.

हम उस राज्य की बात कर रहें हैं, जहाँ का इतिहास सदियों पुराना है. इतिहास के पन्ने को उठाकर देखें तो उनमें कहीं भी अंगूठा छाप राजा और विद्वान भिखारी के कहानी मौजूद हों. आलम ये है कि राज्य के इतिहास को गर्त में गिराने के तमाम उपाय किये जा रहें हैं. कुछ समय पहले तक राज्य की शिक्षा व्यवस्था ऐसी थी, कि शिक्षक शिक्षा के प्रति जागरूक थे, वो खुद भी पठन-पाठन करते थे, और बच्चो को भी प्रेरित करते थे, जिसका परिणाम पूरी दुनिया को देखने को मिलती थी. लेकिन वर्तमान समय का आलम ये है कि अंगूठा छाप को डॉक्टरेट की डिग्री से सम्मानित किया जाता है, और पढ़े-लिखे को फेल से सम्मानित किया जाता है. फेल किये गये लोग जब अपने सम्मान की लड़ाई में दर-दर की ठोकर खा रहें हैं या उनलोगों को लाठियों से कुटाई की जा रही हैं. आधुनिक युग के इतिहास के प्रथम पन्ने पर ये गाथा स्वर्ण अक्षरों से लिखी जा रहीं है.

वर्तमान समय का आलम ये है कि राज्य में कुछ समय पूर्व नौकरियां आलू-प्याज के ऐसी बांटी जा रही थी, उस वैतरणी को पार करने के लिए राज्य में कई लोग ऐसे भी थे कि, एक दिन की नौकरी कर रिटायर हो कर पेंशन ले रहें हैं. दूसरी तरफ योग्य-अयोग्य लोगों को एक निश्चित रकम पर बहाली करने का अधिकार अंगूठा छाप को दिया गया….. जिन लोगों को हिंदी या अंग्रेजी की वर्णमाला की ठीक-ठाक से जानकारी नहीं है, वो लोग समाज के नौनिहाल के भविष्य बनाने में अपना योगदान दे रहें हैं. आप खुद भी समझ सकते हैं कि, जिस राज्य का मुखिया टेक्निकल ग्रेजुएट हों, उस राज्य में छात्रों को पढ़ाने के लिए अच्छे शिक्षक की योग्यता क्या होनी चाहिए…? राज्य के मुखिया व उनके सहयोगी शिक्षा व्यवस्था की अस्मत को लुट कर ताड-ताड करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहैं हैं. एक समय ऐसा था कि राज्य में अच्छे स्कूल-कॉलेज की संख्या कम थी, लेकिन वर्तमान समय में इसकी संख्या कुछ हद तक ठीक है… परन्तु शिक्षक नहीं हैं. बच्चो का नामांकन तो हो जाता है…. लेकिन पढने के लिए दर-दर की ठोकर खाने को विवश हो रहें हैं, चाहे वो प्राइमरी के बच्चे हों, हायर सेकेंडरी हों, टेक्नीकल या नॉन टेक्नीकल.

स्कूल-कालेज नामांकन तो लेते हैं परन्तु पठन-पाठन के लिए कोचिंग-ट्यूशन पर निर्भर होना पड़ रहा है. साल की दो परीक्षा लेने में भी सरकारी तन्त्र के हाथ-पांव फुल रहे हैं. किसी तरह इसकी टोपी उसके सिर पड़ रख कर बच्चो के भविष्य से खिलवाड़ कर रहें हैं. यूँ तो कहा जाता है कि विद्वान के पास लक्ष्मी नहीं सरस्वती ही होती है, परन्तु वर्तमान समय का आलम ये कि सरस्वती लुप्त हो गई है, और लक्ष्मी ही सबकुछ है. अगर आपके पास पर्याप्त मात्रा में लक्ष्मी उपलब्ध हो तो, सरस्वती खुद ही चलकर आपके पास आ जाएगी. जब टैलेंट की कद्र ही न हो तो, टैलेंट के नाम पर तामझाम क्यों…? वर्तमान समय में राज्य की शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि “टैलेंट का मतलब ठेला गाड़ी” ही होता है…