जीवाणु (Bacteria)…

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जीवाणु अति सूक्ष्म होते हैं और यह अनुकूल तथा प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में पाये जाते हैं. फोटो:- गूगल.

जीवाणु अति सूक्ष्म होते हैं और यह अनुकूल तथा प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में पाये जाते हैं. यह मनुष्य द्वारा साँस लेने की वायु, पीने के जल तथा भोजन में मौजूद रहते हैं. यह मिट्टी में, दूसरी जीवित वस्तुओं में और मृत जैव पदार्थों में भी उपस्थित रहते हैं. बतातें चलें कि, मानव के मुंह में भी कई प्रकार के जीवाणु पाये जाते हैं.

जीवाणु की खोज वर्ष 1683ई० में हॉलैंड के वैज्ञानिक एण्टॉनी वॉन ल्यूवेनहॉक (Antony VonLeeuwenhock) ने की थी. एक दिन एण्टॉनी वॉन ल्यूवेनहॉक अपने दांतों को खुरच रहे थे और अपने बनाए हुए सूक्ष्मदर्शी से उन खुरचानों को देखा तो उनमें इन जीवाणुओं को देख कर इन्हें सूक्ष्म जीव (Tiny animalcules) कहा. इसी कारण से ल्यूवेनहॉक को जीवाणु विज्ञान का पिता (Father of Bacteriology) कहा जाता है. उसके बाद वर्ष 1829 ई. में एहरेनबर्ग (Ehrenberg) ने इन सूक्ष्म जीवोन का नाम जीवाणु (Bacteria) दिया.

लुई पाश्चर ने किण्वन पर रिसर्च कर कहा कि, पदार्थों का सड़ना तथा अनेक रोगों का कारण सूक्ष्मजीव होते हैं. वर्ष 1881 रॉबर्ट कोच (Robert Koch) ने सिद्ध किया कि जानवरों में होनेवाली एन्थ्रेक्स (Anthrax) रोग तथा मनुष्यों में तपेदिक रोग (Tuberculosis) तथा हैजा (Cholera) रोग का कारण भी जीवाणु है. सबसे पहले जीवाणुओं का कृत्रिम संवर्द्धन (Artificial culture) रॉबर्ट कोच ने ही किया था.

जीवाणु का सम्पूर्ण शरीर एक ही कोशिका का बना होता है और इसके चारों ओर एक कोशिकाभित्ति पायी जाती है. कोशिकाभिति के नीचे कोशिका झिल्ली होती है जो प्रोटीन एवं फॉस्फोलिपिड की बनी होती है. इसके कोशिका द्रव्य में माइटोकॉण्ड्रिया, अंत:द्रव्य जालिका तथा अन्य विकसित विकसित कोशिकांग का अभाव होता है. इनमें प्राथमिक प्रकार का केन्द्रक पाया जाता है जिसे न्यूक्लिआइड (Nucleoid) कहते हैं. जीवाणुओं में रोम और कशाभिका भी पाए जाते हैं जो उन्हें गमन, पोषण एवं प्रजनन में सहायता प्रदान करते हैं.

लक्षण :-

  • विषाणु को छोड़कर जीवाणु सबसे सरलतम जीव है.
  • ये सभी स्थानों पर पाये जाते हैं.
  • ये एककोशिकीय जीव हैं जो एकल या समूहों में पाये जाते हैं.
  • इसका आकार 2-10 μ तक होता है.
  • इनकी कोशिकाभित्ति मोटी तथा काइटिन (Chitin) की बनी होती है.
  • इनमें केन्द्रक का अभाव होता है और ये परजीवी, मृतोपजीवी अथवा सहजीवी होते हैं.
  • इनकी कोशिका में लवक, माइटोकॉण्ड्रिया, गॉल्जी उपकरण तथा अंत:द्रव्यी जालिका नहीं होते हैं.
  • इनमें जनन मुख्य रूप से विखण्डन द्वारा होता है.

आकृति के आधार पर :-

  1. शलाकवत् (Bacillus):- इस प्रकार का जीवाणु छड़नुमा या बेलनाकार आकृति का होता है.जैसे- बेसिलिस एन्थ्रासिस.
  2. गोलाकार (Coccus):-गोलाकार आकृति के जीवाणुओं को कोकस (Coccus) के नाम से जाना जाता है. यह जीवाणु सबसे छोटा होता है.

कोशिकाओं के विन्यास के आधार पर ये कई प्रकार के होते हैं जैसे…

  • माइक्रोकोकाई (Micrococci):- एक कोशिका के रूप में, जैसे – माइक्रोकोकस (Micrococcus).
  • डिप्लोकोकाई (Diplococci):- दो-दो कोशिकाओं के समूह में,जैसे- डिप्लोकोकस न्यूमोनी (Diplococcus pneumoniae) .
  • स्ट्रेप्टोकोकाई (streptococci):- अनेक कोशिकाओं के समूह में, जैसे- स्ट्रेप्टोकोकस लैक्टिस (streptococcus Iactis).
  • सारसिनी(sarcinae):- 08, 64 और 128 के घनाकृतिक पैकेट में, जैसे- सारसीना (Sarcina).
  1. सर्पिलाकृतिक(spirallior Helical):-इस प्रकार का जीवाणु coiled या spiral होता है. जैसे- स्पाइरिलमसारसि रुप्रेम (Spirillum ruprem).
  2. कौमा(Comma):- इस प्रकार का जीवाणु अंग्रेजी के चिह्न कौमा (,) के आकार के होते हैं. जैसे- विब्रियो कोमा (Vibrio comma).

पोषण(Nutrition)…

जीवाणुओं में मुख्यतः दो प्रकार का पोषण पाया जाता है. (अ) स्वपोषी पोषण (Autotrophic  nutrition) और (ब) विषमपोशी पोषण (Heterotrophic nutrition).  

स्वपोषी पोषण (Autotrophic nutrition) :- जीवाणु अपने भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं. यह दो प्रकार के होते हैं…

  • प्रकाश संश्लेषी (Photo synthetic) :- इस प्रकार के पोषण के अन्तर्गत जीवाणु प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बनाते हैं. इनमें पर्णहरित की जगह जीवाणु पर्णहरित होता है. जैसे- क्रोमैटियम (Chromatium), रीडोस्पिरिलम (Rhodospirillum).
  • रसायन संश्लेषी (Chemosynthetic):- इस प्रकार के पोषण के अन्तर्गत जीवाणु अकार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त करते हैं. जैसे- नाइटोसोमोनास (Nitosomones), नाइटोबैक्टर (Nitobacter).

विषमपोशी पोषण (Heterotrophic nutrition):- इस प्रकार के पोषण के अंतर्गत जीवाणु अपना भोजन दूसरे जीवों से प्राप्त करते हैं. ये तीन प्रकार के होते हैं…

  1. परजीवी (Parasitic):- इस प्रकार के पोषण में एक जीवाणु दूसरे जीव पर आश्रित रहते हैं और रोग कारक होते हैं. जैसे- माइकोबैक्टीरियम (Mycobacterium).
  2. सहजीवी (symbiotic):- इस प्रकार के पोषण में जीवाणु अन्य जीव के शरीर में रहकर भोजन प्राप्त करते हैं, लेकिन उस जीव को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाते हैं. जैसे- राइजोबियम (Rhizobium).
  3. मृतोपजीवी (saprophytic):-इस प्रकार के पोषण में जीवाणु मृत अवशेषों से भोजन प्राप्त करते हैं. जैसे- लैक्टोबेसिलस (Lactobacillus).