जनेऊ क्या है…

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शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है. यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित होता है.फोटो:-गूगल.

                               यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
                               आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

हिन्दू परम्परा में 16 उपनयन संस्कार होते हैं, जिसमें एक संस्कार होता है ‘उपनयन संस्कार’ या ‘यज्ञोपवीत संस्कार’. पूर्व काल में इस संस्कार के होने के बाद ही बालक को शिक्षा या पूजा-हवन करने का अधिकार मिलता था. जब किसी बालक की उम्र दस से बारह वर्ष की हो जाती है उसके बाद ही ‘उपनयन संस्कार’ या ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ किया जाता है. ब्रहामण, क्षत्रिय और विषयों को ही ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ किए जाते हैं. पौराणीक काल से ही हिन्दू समाज में जनेऊ धारण करने की परम्परा रही है.

कच्चे सूत से बना पवित्र धागा होता है जो तीन धागों वाला एक सूत्र होता है जिसे हिंदी में जनेऊ और संस्कृत भाषा में “यज्ञोपवीत” कहा जाता है. जनेऊ वास्तव में एक सफेद रंग का धागा होता है, जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है. जनेऊ एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है. यह केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अत: इसको सदैव धारण करना चाहिए. जनेऊ परंपरा निभाने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है.

यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत, यज्ञसूत्र या जनेऊ एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है. इसमें सात ग्रन्थियाँ लगायी जाती हैं. ब्राह्मणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है. तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है. तीन सूत्र हिन्दू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं.

                          भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥

नोट:- यज्ञोपवीत संस्कार 96 ब्राम्हण के लिए है 92 क्षत्रिय लगभग 90/86 वैश्य और 84शूद्र की लंबाई.

तीन सूत्र क्यों :- जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं. यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है. यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है. यह तीन आश्रमों का भी प्रतीक होता है जबकि, संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है.

नौ तार :- यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं. इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है. एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं.

पांच गांठ :- यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक होता है. यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक होता है.

जनेऊ की लंबाई :- यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है. इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए.

चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है. 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि.

जनेऊ के नियम :-

  • यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए. इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो. अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए.
  • यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 06 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए. खंडित यज्ञोपवीत को शरीर पर धारण नहीं किया जाता है. धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो उसे बदल देना ही उचित होता है.
  • मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि नहीं बांधने चाहिए.
  • चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है. मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है.
  • कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है. कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है. वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है.
  • माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है. यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित होता है.
  • जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है.
  • जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है, मन को बुरे कार्यों से बचाती है. कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है.

 

                                                                                                        संजय कुमार पाठक.