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गुरू-पूर्णिमा…

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

हिन्दुओं का विशेष पर्व “गुरु पूर्णिमा” आषाढ़ महीने की “पूर्णिमा” को ही “गुरु पूर्णिमा” कहते हैं, यह  वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है. इसी दिन को गुरु पूजा का पर्व मनाया जाता है. शास्त्रों के अनुसार “गु” का अर्थ होता है- “अंधकार या मूल अज्ञान” और “रु” का का अर्थ होता है किया गया है- उसका निरोधक. गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि, वह अज्ञान रूपी अन्धकार को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर कर देता है, अर्थात दो अक्षरों से मिलकर बने ‘गुरु’ शब्द का अर्थ – प्रथम अक्षर ‘गु का अर्थ- ‘अंधकार’ होता है जबकि दूसरे अक्षर ‘रु’ का अर्थ- ‘उसको हटाने वाला’ होता है. अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ही ‘गुरु’ कहा जाता है. गुरु वह है जो अज्ञान को दूर करता है, अथवा गुरु वह है, जो धर्म का मार्ग दिखाता है.

वाल्व्यास सुमनजीमहाराज कहते है

राम कृष्ण सबसे बड़ा उनहूँ तो गुरु कीन्ह

तीन लोक के वे धनी गुरु आज्ञा आधीन॥

गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों में की गई है. ईश्वर के अस्तित्व में मतभेद हो सकता है, किन्तु गुरु के लिए कोई मतभेद आज तक नहीं हुआ है. प्रत्येक गुरु भी दूसरे गुरु को आदर-प्रशंसा एवं पूजा सहित पूर्ण सम्मान देतें है. भारत के बहुत से संप्रदाय तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं. गुरु ने जो भी नियम बताए हैं उन नियमों पर श्रद्धा से चलना शिष्य का परम कर्तव्य होता है. गुरु का कार्य नैतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को हल करना भी होता है. राजा दशरथ के दरबार में गुरु- वशिष्ठ से भला कौन परिचित नहीं होगा?, जिनकी सलाह के बगैर दरबार का कोई भी कार्य नहीं होता था. गुरु की भूमिका भारत में केवल आध्यात्म या धार्मिकता तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि  देश पर राजनीतिक विपदा आने पर गुरु ने देश को उचित सलाह देकर विपदा से उबारा भी है या यूं कहें, अनादिकाल से गुरु ने शिष्य का हर क्षेत्र में व्यापक एवं समग्रता से मार्गदर्शन किया है. अतः सद्गुरु की ऐसी महिमा के कारण उसका व्यक्तित्व माता-पिता से भी ऊपर होता है. गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक के अनुसार- यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे’ तथा गुरु के जैसी भक्ति की आवश्यकता होती है, वैसी ही जैसी देवता के लिए भी होती है. सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव होता है, गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं होता है.

गुरु की महिमा के अनुसार ही उन्हें ईश्वर से भी ऊँचा पद दिया गया है. शास्त्र वाक्य में ही गुरु को ही ईश्वर के विभिन्न रूपों में जैसे… ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है. गुरु को ही ब्रह्मा कहा गया,  क्योंकि वह शिष्य को बनाता है, नव जन्म देता है. गुरु, विष्णु भी है, क्योंकि वह शिष्य की रक्षा करता है गुरु, साक्षात महेश्वर भी है क्योंकि वह शिष्य के सभी दोषों का संहार भी करता है.

संत कबीर कहते हैं -‘हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर.’ कहने का तात्पर्य है कि, भगवान के रूठने पर तो गुरू की शरण ही रक्षा कर सकती है, किंतु गुरू के रूठने पर कहीं भी शरण मिलना सम्भव नहीं होता है. जिसे ब्राह्मणों ने आचार्य, बौद्धों ने कल्याणमित्र, जैनों ने तीर्थंकर और मुनि, नाथों तथा वैष्णव संतों और बौद्ध सिद्धों ने उपास्य सद्गुरु कहा है उस श्री गुरू से उपनिषद् की तीनों अग्नियाँ भी थर-थर काँपती हैं. त्रिलोकपति भी गुरू का ही गुणनान किया करते है. ऐसे गुरू के रूठने पर कहीं पर कहीं भी ठौर नहीं मिलता.

कबीरदास जी कहते है… सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार लोचन अनंत, अनंत दिखावण हार – अर्थात सद्गुरु की महिमा अपरंपार है. वे शिष्यों पर अनंत उपकार करते है, विषय-वासनाओं से बंद शिष्य की बंद ऑखों को ज्ञान चक्षु द्वारा खोलकर उसे शांत ही नहीं, अनंत तत्व ब्रह्म का दर्शन भी करावा देते हैं.

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