गुरु या व्यास पूर्णिमा…

गुरु या व्यास पूर्णिमा…

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संत कबीर कहते हैं -‘हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर.’ फोटो:-गूगल

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार आषाढ़ महीने की “पूर्णिमा” के दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था. वेदव्यास जी ने महाभारत एवं श्रीमद्भागवत सहित 18 पुराणों एवं 18 उपनिषदों की रचना की थी. इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है.   

 ‘गुरु’ दो अक्षरों से मिलकर बना एक शब्द है जिसका अर्थ होता है… अंधकार को दूर कर प्रकाश की ओर ले जाना… या यूँ कहें कि, गुरु वह है जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाना वाला ही गुरु होता है.

पौराणिक ग्रंथों में भी गुरु तत्व की प्रशंसा की गई है. . ईश्वर के अस्तित्व में मतभेद हो सकता है, किन्तु गुरु के लिए कोई मतभेद आज तक नहीं हुआ है. प्रत्येक गुरु भी दूसरे गुरु को आदर-प्रशंसा एवं पूजा सहित पूर्ण सम्मान देतें है.  गुरु ने जो भी नियम बताए हैं उन नियमों पर श्रद्धा से चलना शिष्य का परम कर्तव्य होता है. गुरु का कार्य नैतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को हल करना भी होता है.  

हिन्दू संस्कृति को गुरु का महत्व विशेष होता है पौराणिक ग्रंथों में भी कई कहानियों में गुर शिष्य परम्परा का वर्णन मिलता है. अनादी काल से ही गुरु की सलाह सिर्फ आध्यात्म या धार्मिकता तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि  देश पर राजनीतिक विपदा आने पर गुरु ने देश को उचित सलाह देकर विपदा से उबाराते भी हैं. एक श्लोक के अनुसार- ‘यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरु’ के जैसी भक्ति की आवश्यकता होती है, वैसी देवता के लिए भी होती है. सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव होता है, गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं होता है.

गुरु की महिमा के अनुसार ही उन्हें ईश्वर से भी ऊँचा पद दिया गया है. शास्त्र वाक्य में ही गुरु को ही ईश्वर के विभिन्न रूपों में जैसे… ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है. गुरु को ही ब्रह्मा कहा गया,  क्योंकि वह शिष्य को बनाता है, नव जन्म देता है. गुरु, विष्णु भी है, क्योंकि वह शिष्य की रक्षा करता है गुरु, साक्षात महेश्वर भी है क्योंकि वह शिष्य के सभी दोषों का संहार भी करता है.

संत कबीर कहते हैं -‘हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर.’ कहने का तात्पर्य है कि, भगवान के रूठने पर तो गुरू की शरण ही रक्षा कर सकती है, किंतु गुरू के रूठने पर कहीं भी शरण मिलना सम्भव नहीं होता है. जिसे ब्राह्मणों ने आचार्य, बौद्धों ने कल्याणमित्र, जैनों ने तीर्थंकर और मुनि, नाथों तथा वैष्णव संतों और बौद्ध सिद्धों ने उपास्य सद्गुरु कहा है उस श्री गुरू से उपनिषद् की तीनों अग्नियाँ भी थर-थर काँपती हैं.

त्रोलोक्यपति भी गुरू का ही गुणनान किया करते है. ऐसे गुरू के रूठने पर कहीं पर कहीं भी ठौर नहीं मिलता. कबीरदास जी कहते है… सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार लोचन अनंत, अनंत दिखावण हार – अर्थात सद्गुरु की महिमा अपरंपार है. वे शिष्यों पर अनंत उपकार करते है, विषय-वासनाओं से बंद शिष्य की बंद ऑखों को ज्ञान चक्षु द्वारा खोलकर उसे शांत ही नहीं, अनंत तत्व ब्रह्म का दर्शन भी करावा देते हैं.