गुप्त साम्राज्य-01…

गुप्त साम्राज्य-01…

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पिछले भाग में गुप्त सम्राज्य के प्रांतीय शासन तक पढ़ा था अब प्रशासन, न्याय, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के बारे में जानते हैं…

 प्रशासन :-

  • गुप्त साम्राज्य में स्थानीय प्रशासन को दो भागों में बांटा गया था.
  1. नगर प्रशासन ग्राम प्रशासन
  • नगर प्रशासन के प्रमुख पदाधिकारियों को पुरपाल,या द्रांगिक कहा जाता था. यह नगर परिषद् की सहायता से समस्त समस्त नागरिक सुविधाओं तथा सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था.
  • नगर परिषद् के प्रमुख को ‘नगरपति’ कहा जाता था. अवस्थिक नामक कर्मचारी धर्मशालाओं के पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करते थे.
  • नियुक्तियों का विभाजन अनेक जिलों में किया गया था. इन जिलों को विषय कहा जाता था. इसकी नियुक्ति उपरिक द्वारा की जाती थी.
  • विषयपति की सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक विषयपरिषद् होती थी, जिसकी नियुक्ति प्रायः पांच वर्ष के लिए की जाती थी.
  • विषय परिषद् के सदस्य विषय महत्व कहलाते थे. इनमें सार्थवाह, प्रथम कुलिक और कायरथ शामिल थे.
  • गुप्त काल में ग्राम, प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी. प्रत्येक विषय के अंतर्गत कई ग्राम होते थे.
  • ग्राम और विषय के मध्य एक और इकाई के अस्तित्व का साक्ष्य मिलता है. इसे ‘पेय’ कहा जाता था. पेय कई ग्रामों का एक समूह था.
  • ग्राम प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी ग्रामपति या ग्रामिक था. उसकी सहयता के लिए एक ग्राम पंचायत थी.
  • इस ग्राम सभा को मध्य भारत में ‘पंचमजुली’, वहीं, बिहार में ग्राम जनपद कहा जाता था.

न्याय व्यवस्था :-

  • गुप्त काल में न्याय व्यवस्था का समुचित प्रबंध किया गया था.
  • गुप्तकाल में न्यायालय के चार वर्ग थे.- राजा का न्यायालय 2. पूग 3. श्रेणी 4. हुल.
  • गुप्त काल में दण्डविधान कठोर था. इस काल के न्यायाधीश दण्डनायक, सर्वदण्डनायक और महादण्डनायक थे.
  • निम्न स्तर पर न्यायिक मामलों का निपटारा समिति, परिषदें तथा संस्थाएं भी करती थीं.
  • न्यायायिक मामलों में मंत्री और पुरोहित भी सहायता करते थे.

सामाजिक व्यवस्था :-

  • गुप्तकालीन समाज पम्परागत चार वर्गों अर्थात, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में विभक्त था.
  • समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था. ब्राह्मणों के 6 कर्तव्य माने जाते थे- अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना, दान देना एवं दान लेना.
  • न्याय संहिताओं में कहा गया है की ब्राह्मण की परीक्षा तुला से, क्षत्रिय की अग्नि से, वैश्य की जल से तथा शूद्र की विष से की जानी चाहिए.
  • इस काल के ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि, ब्राह्मण को शूद्र का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि इससे अध्यात्मिक बल घटता है. जबकि, मनु के अनुसार दास वर्षीय ब्राह्मण सौ वर्षीय क्षत्रिय से श्रेष्ठ था. ब्राह्मण एवं क्षत्रिय क्रमशः पिता और पुत्र तुल्य थे.
  • अमरकोश में शिल्पियों को शूद्र वर्ग में स्थान दिया गया है.
  • नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है.
  • फाह्यान के अनुसार अछूत नगर एवं बाज़ार से बाहर इकटठे थे. मंद्स्मृति में दासों के सेनापति विषयक अधिकारों की पर्याप्त चर्चा है.
  • गुप्त काल में कायस्थ जाति का उदय हुआ. कायस्थ प्रारंभ में लिपिक का कार्य करने वाले लोग थे, जो आगे चलकर एक जाति के रूप में विकसित हो गए.
  • गुप्त काल में स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आयी. सामान्यतः 12-13 वर्ष की आयु में लडकियों की शादी कर दी जाती थी.
  • स्मृतियों में लड़कियों के पुनयन तथा वेदाचयन का निषेध किया गया था वहीं, देवदासी प्रथा का भी प्रचलन था.
  • इस काल में विधवाओं की स्थिति अत्यंत सोचनीय थी. हालाँकि नारद एवं परामर्श स्मृति में विधवा विवाह का वर्णन मिलता है.
  • गुप्तकाल में सती प्रथा की शुरुआत मानी जाती है, क्योंकि सती प्रथा का पहले अभिलेख प्रमाण 510 ई. के भानुगुप्त के अभिलेख से मिलता है.
  • गुप्तकालीन साहित्य एवं कला में नारी का आदर्शमयचित्रण है परंतु व्यावहारिक रूप में उनकी स्थिति पहले की अपेक्षा काफी दयनीय हो गयी थी.
  • गौतम ने वैश्य पुरुष और शूद्र स्त्री की संतान को ‘उग्र’ कहा है. स्मृतियों के अनुसार क्षत्रिय पुरुष और शुद्र स्त्री की संतान को भी ‘उग्र’ कहा गया है.

आर्थिक व्यवस्था :-

  • आर्थिक दृष्टि से गुप्त काल सम्पन्नता का काल था. इस काल के लोगों का जीवन समृद्धि से परिपूर्ण था.
  • इस काल में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था. चावल और जौ मुख्य फसलें होती थीं.
  • प्राचीन परम्परा के अनुसार राजा भूमि का मालिक होता था. वह भूमि से उत्पन्न उत्पादन का 1/6 भाग का अधिकारी था. जिसे राजकीय आय का मुख्य स्रोत माना जाता था.
  • मुख्य करों के अतिरिक्त हिरण्य, प्रणय, आदि जैसे अन्य करों का भी उल्लेख मिलता है.
  • करों की अदायगी हिरण (नकद) तथा ‘मेय’ (अन्न के तौल) दोनों ही रूपों में की जाती थी.
  • अमरकोष में 12 प्रकार के भूमि कर का उल्लेख मिलता है.
  • सिंचाई का सर्वोत्तम उदाहरण स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है. सिंचाई के लिए रहट या घट्टी यंत्र का प्रयोग किया जाता था.
  • गुप्त शासकों ने सबसे अधिक स्वर्ण सिक्के जारी किये थे. सोने के सिक्कों को गुप्त अभिलेखों में दीनार कहा गया है.
  • चांदी के सिक्कों का प्रयोग स्थानीय लेन-देन में किया जाता था.
  • गुप्तकाल की व्यापारिक गतिविधियों के बारे में श्रेणियों की मुहरों आदि से जानकारी मिलती है.
  • व्यापारियों की एक समिति होती थी, जिसे नियम कहा जाता था. नियम के प्रधान को श्रेष्ठि कहा जाता था. व्यापारियों के समूह को सार्थ तथा उनके मुखिया को सार्थवाह कहा जाता था.
  • मंदसौर अभिलेख से पता चलता है, की रेशम बुनकरों की श्रेणी ने एक भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था.
  • गुप्त काल में एक और प्रमुख उद्योग था वस्त्र उद्योग. अमरकोश में कटाई, बुनाई, हथकरघा, धागे इत्यादि का सन्दर्भ आया है.
  • इस काल में विदेशों से भी व्यापारिक सम्बन्ध थे. इनमे वेजेन्टाईन साम्राज्य तथा चीन प्रमुख थे.
  • विदेशों को निर्यात की जाने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तुओं में मसाले और रेशम होते थे.

कला और साहित्य :-

  • कला और साहित्य के अप्रतिम विकास के आधार पर ही भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को ‘स्वर्णयुग’ कहा गया है. साहित्य की दृष्टि से गुप्त काल अत्यंत समृद्ध था.
  • गुप्तकाल में ही सम्पूर्ण मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ। शिखर युक्त मंदिरों का निर्माण गुप्तकला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता थी
  • इस काल में ही मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ. गुप्तकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषताओं में शिखर युक्त मंदिरों का निर्माण करना. इस काल का सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ की मूर्तियाँ हैं. वहीं, इस काल में मूर्तियों की बनावट, भाव भंगिमा और कलात्मकता निःसंदेह अतुलनीय है. जिसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है- अजंता की गुफाएं.
  • कालिदास ने युगांतरकारी साहित्य की रचना से गुप्तकाल को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिया है.
  • कुमारसंभव, मेघदूत, ऋतुसंहार और अभिज्ञानशाकुन्तलम जैसी कालजयी कृतियों की रचना गुप्तकाल में ही हुईं थीं.
  • पुराणों तथा नारद कात्यारान, पराशर, वृहस्पति आदि स्मृतियों की रचना भी गुप्तकाल में ही हुई थी. विज्ञान के क्षेत्र में भी साहित्य का सृजन हुआ. ब्रह्मसिद्धांत, आर्यभिटयम और सूर्यसिद्धान्त की रचना करने वाले आर्यभट्ट थे.
  • कामंदक ने ‘नीतिसार’ और वात्सायन में कामसूत्र की रचना गुप्तकाल में ही की.
  • विष्णु शर्मा द्वारा रचित ‘पंचतंत्र’ गुप्तकालीन साहित्य का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है.
  • यास्क कृत ‘निघतु’ निरुक्त से वैदिक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है. भट्टी, भौमक आदि व्याकरण के विद्वान् थे.
  • इस काल में बौद्ध साहित्य की भी रचना हुई, बुद्धघोष में सुमंगलविलासिनी की रचना की. इसके अतिरिक्त ‘लंकावतारसूत्र’ ‘महायानसूत्र’ ‘स्वर्णप्रभास’ आदि बौद्ध कृतियों की भी रचना की गयी.
  • जैनाचार्य सिद्धसेन ने तत्वानुसारिणी तत्वार्थटीका नामक ग्रन्थ की रचना की थी.