क्या हमारी सोच कुंठित होती जा रही है ?

क्या हमारी सोच कुंठित होती जा रही है ?

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हम सभी अपनी बात मनवाने के लिए तमाम तरह के उपाय करते रहते हैं और कुछ हद तक कामयाब भी हो जाते हैं चाहे उसके कारण कुछ भी क्यों न हो? फोटो:-गूगल

आधुनिक जीवन शैली में हमारी सोच कुंठित होती जा रही है. हम सभी अपनी बात मनवाने के लिए तमाम तरह के उपाय करते रहते हैं और कुछ हद तक कामयाब भी हो जाते हैं चाहे उसके कारण कुछ भी क्यों न हो? अक्सर हम सभी कुछ बातों को जेनेरेशन गैप कह कर टाल जाते हैं. आखिर ये जेनेरेशन गैप हम सभी जिसे कहते हैं ! क्या वो कुंठित सोच का हिस्सा नहीं है?आज हम सभी बड़े गर्व से कहते हैं कि, 21वीं सदी में जीवन यापन कर रहे हैं. 21वीं सदी में हाथ से कम मशीन से ज्यदा काम करते हैं या यूँ कहें कि मशीन युग में ही जीवन यापन कर रहे हैं.

मानसिक तनाव व बेरोजगारी की मार और गरीबी भी 21वीं सदी का हिस्सा है. हम सभी अपनी मूल जिन्दगी और स्वरूप से दूर होते जा रहे हैं, कुछ बातें तो किताबों में ही देखने को मिलती है. 21वीं सदी में प्रकृति या यूँ कहें कि आवो-हवा भी बदल गई है. इस बदलती जिन्दगी में सहारे की जरूरत नहीं होती है बस एक सीढ कि जरूरत होती है जो उसे ऊँचाइयों तक ले जा सके. 21वीं सदी में तनाव से हर कोई परेशान है चाहे बच्चा हो जवान हो या बुजुर्ग सभी इससे परेशान है कुछ हैरान व परेशान हैं तो कुछ ……

एक समय था जब हमारे बुजुर्ग कहते थे कि, बच्चों के पास क्या गम है सिर्फ खाना, खेलना और पढना ही तो है…. वर्तमान समय में बच्चे भी तनाव से गुजर रहें है, “क्या वो कल था”….. और आज क्या है? हम सभी पीढ़ियों को भुलाकर जेनेरेशन गैप का बहाना बना कर “वो कल” को भूल गये है य यूँ कहें कि भुलाने की पूरी कोशिस कर रहे हैं. एक समय था जब बारिश होती थी तो मिटटी की सुहानी खुशबु सूंघने में आनंद आता था लेकिन आज मिटटी की खुशबू की जगह धुंआ और सीमेंट की खशबू का आनंद लेते हैं. हमारी सोच तो आधुनिक हो गई है साथ मानसिक विकार भी और अधिक ज्घयन या यूँ कहें कि विकृत होती जा रही है.

वर्तमान समय का आलम यह है कि, मशीनी युग में सोच भी मशीनी होनी चाहिए, लेकिन हालत ये है कि, आधुनिक युग में मनुष्यों की सोच जाति और धर्म पर आकर सिमट गई है. हमे अपने इतिहास को बचाना और संवारना दोनों है लेकिन वर्तमान समय का आलम यह है कि मानव ने कितनी भी प्रगति कर ली हो, लेकिन सोच वही पुरातन ही है. धर्म ग्रन्थों या किताबों में लिखी बातों को हमसभी पढ़ते जरुर है लेकिन, जीवन में अमल करना नहीं जानते हैं. मशीनी युग में हमारी दिनचर्या में काफी परिवर्तन आया है, दिनचर्या के परिवर्तन से जिन्दगी के सोच और मायने ही बदल गये है.

आज के मानव हर जगह मानव समाज को नष्ट करने पर तुला हुआ है, और समाज मूक दर्शक बने बैठे हैं. चंद लोगों के निजी स्वार्थ के ही कारण, आज समाज के हर वर्ग में क्षोभ व्याप्त है, खासकर बच्चे और युवा जो देश के भविष्य हैं, वो चंद लोगों के कारण ही अपने भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं हैं. आज के बच्चे व युवाओं में तनाव बढ़ता ही जा रहा है. तनाव का आलम यह है कि, बच्चों में आत्महत्या की प्रवृति बढती ही जा रही है. दौडती-भागती जिन्दगी में आज के माता-पिता अपने बच्चों को कम समय या यूँ कहें कि, नहीं के बराबर समय देते है, जिसका प्रभाव भी बच्चों के मन पर पड़ता है.

विज्ञान ने प्रगति की है लेकिन, टेक्नोलोजी का ज्यादा प्रयोग भी बच्चों व यवाओं के मन मस्तिष्क पर पड़ता है और इसका असर इतना घातक और मीठा होता है. एक बार बच्चों या युवाओं को टेक्नोलॉजी की आदत लग जाने पड़ उससे बाहर निकालना आसन नहीं होता है. आज के बच्चों की पढाई की शुरुआत टेक्नोलॉजी या गैजेट से ही शुरू होती है. टेक्नोलॉजी या गैजेट से निकलने वाली घातक तरंगों या किरणों के प्रभाव में बच्चे या युवा रहते हैं, उन तरंगों का घातक प्रभाव बच्चे या युवाओं के मन व मस्तिष्क पर पड़ता है. आज के बच्चे जोड़, घटाव, गुणा और भाग करने के लिए कैलकुलेटर का प्रयोग करते है. आज के बच्चों का संसार गैजेट से शुरू होकर गैजेट पर ही खत्म हो जाता है.