कालिका माता के रहस्य…

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'काल' का अर्थ होता है ‘समय’ और काल. काल, जो सभी को अपने में निगल जाता है. :-फोटो :- गूगल.

 ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा ।।

हिन्दू धर्म में सबसे जागृत देवी हैं मां कालिका. मां कालिका को खासतौर पर बंगाल और असम में पूजा जाता है. ‘काली’ शब्द का अर्थ काल और काले रंग से है. ‘काल’ का अर्थ होता है ‘समय’ और काल. काल, जो सभी को अपने में निगल जाता है. वेद अनुसार ‘समय ही आत्मा है, आत्मा ही समय है’. मां कालिका की उत्पत्ति धर्म की रक्षा और पापियों-राक्षसों का विनाश करने के लिए हुई है.

मां काली को देवी दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है. कहा जाता है कि, माँ कालिका के दरबार में जो एक बार चला जाता है उसका नाम-पता दर्ज हो जाता है. यहां दंड के साथ आशीर्वाद और शाप भी मिलता है. बताते चलें कि, जो साधक एकनिष्ठ, सत्यवादी और वचन का पक्का है समझो उसका काम भी तुरंत होगा.

देवनन्दन पांडे कहते हैं कि, काली को माता जगदम्बा की महामाया कहा गया है. मां ने सती और पार्वती के रूप में जन्म लिया था. सती रूप में ही उन्होंने दस महाविद्याओं के माध्यम से अपने दस जन्मों की झांकी शिव को दिखा दी थी. पांडे कहते हैं कि, मां काली के चार  स्वरूप हैं- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली.

देवनन्दन पांडे कहते हैं कि, वर्तमान समय में कलियुग चल रहा है और इस कलयुग में तीन  देवता जाग्रत कहे गए हैं- हनुमान, कालिका और भैरव. उन्होंने बताया कि, कालिका की उपासना जीवन में सुख, शांति, शक्ति, विद्या देने वाली बताई जाती है. मां कालिका की भक्ति का प्रभाव व्यावहारिक जीवन में मानसिक, शारीरिक और सांसारिक बुराइयों के अंत के रूप में दिखाई देता है जिससे किसी भी इंसान के तनाव, भय और कलह का नाश हो जाता है.

देवनन्दन पांडे कहते हैं कि, मां दुर्गा ने कई जन्म लिए थे. उनमें से दो जन्मों की कथाएं ज्यादा प्रसिद्ध हैं. पहला, जब उन्होंने राजा दक्ष के यहां सती के रूप में जन्म लिया था और फिर वे यज्ञ की आग में कूदकर भस्म हो गई थीं. दूसरा, जब उन्होंने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया, तब वे पार्वती कहलाईं.

दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र थे. उनकी दत्तक पुत्री थीं सती, जिन्होंने तपस्या करके शिव को अपना पति बनाया, लेकिन शिव की जीवनशैली दक्ष को बिलकुल ही नापसंद थी. शिव और सती का अत्यंत सुखी दांपत्य जीवन था, पर शिव को बेइज्जत करने का खयाल दक्ष के दिल से नहीं गया था. इसी मंशा से उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें शिव और सती को छोड़कर सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया.

जब सती को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने उस यज्ञ में जाने की ठान ली. शिव से अनुमति मांगी, तो उन्होंने साफ मना कर दिया. उन्होंने कहा कि जब हमें बुलाया ही नहीं है, तो हम क्यों जाएं? सती ने कहा कि मेरे पिता हैं तो मैं तो बिन बुलाए भी जा सकती हूं. लेकिन शिव ने उन्हें वहां जाने से मना किया तो माता सती को क्रोध आ गया और क्रोधित होकर वे कहने लगीं- ‘मैं दक्ष यज्ञ में जाऊंगी और उसमें अपना हिस्सा लूंगी, नहीं तो उसका विध्वंस कर दूंगी.’

वे पिता और पति के इस व्यवहार से इतनी आहत हुईं कि क्रोध से उनकी आंखें लाल हो गईं. वे उग्र-दृष्टि से शिव को देखने लगीं. उनके होंठ फड़फड़ाने लगे. फिर उन्होंने भयानक अट्टहास किया. शिव भयभीत हो गए और वो इधर-उधर भागने लगे. दूसरी तरफ क्रोध से सती का शरीर जलकर काला पड़ गया.

उनके इस विकराल रूप को देखकर शिव तो भाग चले लेकिन जिस दिशा में भी वे जाते वहां एक-न-एक भयानक देवी उनका रास्ता रोक देतीं. वे दसों दिशाओं में भागे और 10 देवियों ने उनका रास्ता रोका और अंत में सभी काली में मिल गईं. हारकर शिव सती के सामने आ खड़े हुए और उन्होंने सती से पूछा- ‘ये विभूतिया कौन हैं?’

सती ने बताया- ‘ये मेरे दस स्वरूप हैं. आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं, आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं, पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में द्यूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोडशी हैं और मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं.’ माता का यह विकराल रूप देख शिव कुछ भी नहीं कह पाए और वे दक्ष यज्ञ में चली गईं.

देवनन्दन पांडे कहते हैं कि, दस महाविद्याओं में से साधक महाकाली की साधना को सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली मानते हैं, जो किसी भी कार्य का तुरंत परिणाम देती हैं. साधना को सही तरीके से करने से साधकों को अष्टसिद्धि प्राप्त होती है. काली की पूजा या साधना के लिए किसी गुरु या जानकार व्यक्ति की मदद लेना जरूरी होता है. महाकाली को खुश करने के लिए उनकी फोटो या प्रतिमा के साथ महाकाली के मंत्रों का जाप भी किया जाता है. इस पूजा में महाकाली यंत्र का प्रयोग भी किया जाता है. इसी के साथ चढ़ावे आदि की मदद से भी मां को खुश करने की कोशिश की जाती है. अगर पूरी श्रद्धा से मां की उपासना की जाए तो आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं. अगर मां प्रसन्न हो जाती हैं तो मां के आशीर्वाद से जीवन सुखद व आनंदायक हो जाता है.

 

देवनंदन पांडे.