आयुर्वेद भारतीय संस्कृति का मेरूदंड है:- राज्यपाल लालजी टंडन

आयुर्वेद भारतीय संस्कृति का मेरूदंड है:- राज्यपाल लालजी टंडन

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आयुर्वेद के विकास को नई पीढ़ी को एक चुनौती के रूप में लेते हुए हर संभव प्रयास करना चाहिए. फोटो:-आईपीआरडी, पटना.

शनिवार को राज्यपाल लालजी टंडन ने श्यामजी मंदिर परिसर (बाजार समिति) पटना ) स्थित सभागार में ‘विश्व आयुर्वेद परिषद्’ बिहार इकाई द्वारा आयोजित चर्म-रोग पर आधारित दो-दिवसीय सेमिनार का उद्घाटन करते हुए कहा कि, ‘‘हमारे जीवन पद्धति में धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष-चार पुरूषार्थों का वर्णन है, इन पुरूषार्थ चतुष्टयों की प्राप्ति आरोग्यता पर ही आधारित है. यह आरोग्यता आयुर्वेद से ही संभव है. वर्तमान समय में उपलब्ध चिकित्सा-पद्धतियों में आज भी आयुर्वेद अद्वितीय एवं उत्कृष्ट है.वर्तमान समय में आयुर्वेद की स्वीकार्यता भारत के अतिरिक्त विदेशों में भी बढ़ती जा रही है जरूरी है कि, आयुर्वेद की धरती भारत में एक बार पुनः आयुर्वेद का पुनरोदय हो.’’

राज्यपाल टंडन ने कहा कि, आज संपूर्ण विश्व में दोषपूर्ण जीवन-शैली के कारण मनुष्य विविध प्रकार के रोगों से ग्रस्त होता जा रहा है. जैसे-जैसे हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, विकृतियाँ हमारे निकट आती जा रही हैं. इसीलिए आवश्यक है कि हम आयुर्वेद द्वारा बतायी गई जीवन-शैली का पालन करें. उन्होंने कहा कि आयुर्वेद के विकास को नई पीढ़ी को एक चुनौती के रूप में लेते हुए हर संभव प्रयास करना चाहिए.

राज्यपाल टंडन ने कहा कि, आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि की देवता के रूप में पूजा होती है. उन्होंने कहा कि आयुर्वेद के सुश्रुत को सर्जरी का जनक होने का गौरव प्राप्त है. राज्यपाल टंडन ने कहा कि, जब हम गाँधीजी का 150वाँ जयंती वर्ष मना रहे हैं, तब यह जरूरी है कि हम उनके द्वारा बताये गये प्राकृतिक चिकित्सा और स्वदेशी भावना के मार्ग पर चलने का संकल्प लें. उन्होंने कहा कि आयुर्वेद भारतीय संस्कृति का मेरूदंड है.

राज्यपाल टंडन ने कहा कि, आयुर्वेदिक रसायन एवं भस्मादि दवाएँ काफी महँगी हैं, परन्तु प्राकृतिक जड़ी-बूटियों की काढ़ा आदि औषधियाँ आम गरीबों की भी सहज पहुँच में हैं, जिनके उपयोग से गंभीर असाध्य बीमारियों से भी मुक्ति मिल जाती है. उन्होंने कहा कि, आयुर्वेद में नाड़ी देखकर रोगों के जड़-मूल को पहचानने वाले वैद्य रहे हैं. इनकी संख्या आज भले कम है, परन्तु गंभीर अध्ययन एवं शोध के जरिये आयुर्वेद को आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि चर्मरोगों में आयुर्वेदिक दवाएँ ‘रामबाण’-सी काम करती हैं.

इस कार्यक्रम में राज्यपाल ने ‘स्मारिका’ भी लोकार्पित की तथा स्व॰ वैद्य रमाकांत पाठक की स्मृति में आयोजित ‘निबंध-प्रतियोगिता’ के सफल प्रतिभागियों को पुरस्कृत भी किया. इस कार्यक्रम का संचालन आयुर्वेद चिकित्सक शिवजतन ठाकुर ने किया. इस अवसर पर विश्व आयुर्वेद परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ० बी॰एम॰ गुप्ता, परिषद् के राज्य अध्यक्ष डॉ० आर॰पी॰ उपाध्याय, डॉ० अशोक कुमार दूबे, डॉ० एम॰एम॰ मिश्रा एवं डॉ० प्रजापति त्रिपाठी आदि भी उपस्थित थे.