आखिर क्यों…?

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देश की सबसे बड़ी रेल नेटवर्क ही देश के स्वस्थ अवाम को गम्भीर बीमारी की सौगात दे रही है...

हिन्दू धर्म या परम्परा के अनुसार या यूँ कहें कि, वैदिक रीती से भी अगर आप जीवन जीते हैं, तो बीमारियाँ हमारे शरीर से दूर रहती है. आधुनिक जीवन व बदलती लाइफ-स्टाइल से वर्तमान समय के बच्चे व युवा समय से पूर्व ही कई गम्भीर बीमारियों के शिकार हो रहे है. वर्तमान समय की व्यवस्था चाहे केंद्र या राज्य की हो… दोनों ही स्वास्थ के नाम पड़ आम-आवाम से खिलवाड़ ही करते हैं, उनकी नीतियाँ ही आम-आवाम के जान की दुश्मन बन जाती है. आज हम सभी 21 वीं सदी में जीते हैं…और हमारे बच्चों व युवाओं की सोच टेक्नोलॉजी के साथ आधुनिक हो गई है! पर क्या प्रोढ़ों व बुजुर्गों की सोच टेक्नोलॉजी के साथ आधुनिक हो पाई है? आज भी भारतीय घरों में रुढ़िवादी परम्पराओं का ही बोलवाला है और वर्तमान समय में भी किसी बीमारी का इलाज पहले घर पर ही होता है, उसके बाद झाड-फूंक और अंत में मरने के समय में अस्पताल में या रास्ते में मर जाते है. चाहे छोटी बीमारी हो या बड़ी उसका इलाज पहले घर के डॉक्टर, उसके बाद आस-पडोस के लोग ही डॉक्टर बन जाते हैं… आखिर क्यों?

हिन्द की आजादी के 70 साल पुरे हो चुके हैं…फिर भी स्वास्थ लाभ के लिए आज भी हम सभी पिछड़ों की जिन्दगी में ही जीवन यापन कर रहे हैं या यूँ कहें कि जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं. वर्तमान समय की ऐसी व्यवस्था है कि, सरकार जिन्दा रहने के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू की है जिसका उपयोग आप कई जगहों पर करते हैं जैसे जीने के लिए खाना जरूरी है तो भोजन में भी आरक्षण लागू है, पढाई में भी आरक्षण लागू है यहाँ तक की नौकरी में भी आरक्षण लागू है… यह व्यवस्था हिन्द में कुछ ही लोगों को मिलता है. सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि, इनलोगों को जिन्हें आरक्षण मिलता है उन्हें ज़िंदा रहने के लिए भी आरक्षण मिलना चाहिए वो नहीं मिलता है.

जहां जीवन है, वहां विषाणु भी है, और यही विषाणु बीमारी का घर भी है. यह बात आमतौर पड़ सभी लोग जानते हैं और मानते भी हैं, साथ ही किताबों में भी लिखा हुआ है… पर क्या अपनी जिदगी में इसे लागू कर पाते हैं! अगर सिस्टम में ही वायरस हो तो… वायरस को दूर कैसे कर सकते है, दूसरा पहलू यह भी है कि सिस्टम के साथ-साथ समाज में भी विषाणु ने घर-परिवार बना लिया हो तो, उसे कैसे दूर करेंगे…? वर्तमान समय में सरकार के नुमाइंदे केंद्र हो या राज्य के “ऊँची दूकान मीठी पकवान” ही साबित हो रहे हैं. केंद्र की योजना या यूँ कहें कि, महापरूषों की “वाणी” जिसे हम सभी को अपनी जिन्दगी में उतारना चाहिए… उसकी जगह सरकार के नुमाइंदों ने उसे तमाशा ही बना दिया है. कुर्सी के लिए बच्चों की मौत हो जाती है… उसके जिम्मेदार कुछ लोगों को मानकर “ईतिश्री” कर लेते है. जिनके बच्चे मर गये… उन परिवारों के कलेजे फट रहे हैं.. उनके दुःख पर मरहम की जगह सरकारी नियमों की पोटली रख दी जाती है आखिर क्यों?

सरकारी तन्त्र अपने पद का गलत उपयोग करते हैं और जनता के नुमाइंदे उन्हें अपनी पनाह देते हैं… मिलजुलकर स्वास्थ सेवा के नाम पर दैनिक जीवन में प्रयोग की जाने वाली दवाइयां व कीटनाशक को भी डकार जाते हैं. हिन्द की सबसे बड़ी यातायात सेवा रेल सेवा है. हममे से कई लोग आमतौर पर रेलसेवा का प्रयोग करते है, टिकिट भी लेते है साथ ही टैक्स भी देते है फिर भी रेलवे हमे बीमारियों की सौगात ही देती है आखिर क्यूँ…? हमारे प्रधानमन्त्री बुलेट ट्रेन की बात करते हैं पर देश के अंदर चलने वाले ट्रेनों में साफ़-सफाई व कीटनाशक के प्रयोग को ही करना भूल जाते है. उन्हें तो बस यही याद रहता है कि “पप्पू” ने क्या बोला या उनके जीजा ने कितने का घोटाला किया या उनकी पार्टी कितनी बड़ी डकैत है, इस बात को लगातार बोल रहे हैं? पर उन्हें यह याद नहीं रहता है कि…देश की सबसे बड़ी रेल नेटवर्क ही देश के स्वस्थ अवाम को गम्भीर बीमारी की सौगात दे रही है… आखिर क्यों? केंद्र के दो कदम आगे चल रहे हैं राज्य सरकार… राज्य सरकार के साथ ही चलते है मेयर व पार्षद. नगर निगम बड़ी मुश्किल से शहर का कूड़ा उठा पाती है, निगम की ओर से मच्छरों को भगाने के लिए अस्त्र-शस्त्र की लम्बी फौज होने के वाबजूद भी मच्छरों और बीमारियों से परेशान है आवाम… आखिर क्यूँ?